गलती सरासर मेरी थी। ट्विटर पर कहता रहा यह ब्लॉग हल्के फुल्के मूड़ में रोजमर्रा टाइप के पठन पाठन के लिए रख छोड़ा है लेकिन ब्लॉग में स्पष्ट नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि मेरे कुछ मित्र मेरी निठल्लेपन की लफ्फाजी में गहन साहित्य ढूंढने का प्रयास करते रहे पर साहित्य न तो था न मित्र पाठकों को मिला। इससे नाराज होकर उन्होंने समीक्षक का रूप धारण कर लिया और कह दिया कुछ लिखने से रह गया है या दो अलग अलग कहानी हैं। क्या बताऊं कि यह कहानी है ही नहीं और जब मेरे पास लिखने को ही कुछ नहीं था तो छोड़ने को क्या होता। खैर मैं उनका शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने सरसरी पोस्ट में गहन मगजपच्ची की। मित्रों के समीक्षक होने पर मैं भले शंकित हूँ उनके ज्ञान पर मुझे कोई संदेह नहीं है।
दरअसल भारत ज्ञान प्रधान देश है। भले हमारे पास करने को काम न हो खाने को रोटी न हो बाँटने को ज्ञान भरपूर है और यह काम हम पूरी निष्ठा से करते आये हैं। वैदिक काल में ज्ञान देने का काम ऋषि मुनि लोग किया करते थे वर्तमान युग में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। कौन कब कहाँ से ज्ञान ठेल जाये पता नहीं चलता। बाहर तो छोड़िये घर में बैठे आदमी पर भी पत्नि बच्चे ज्ञान ठेलना शुरू कर देते हैं इन सब से बच बचा कर सोशल मीडिया या टीवी की शरण में चला गया तो ज्ञान की मिक़दार कई गुना बढ़ जाती है। कल मेरे साथ ऐसा ही हुआ। हुआ यूँ कि टीवी ऑन ही किया था कि विज मंत्री गाँधी दर्शन पर "व्यक्तिगत" ज्ञान देते नजर आये। ज्ञान इतना मौलिक था कि इसे सुनकर RBI बिल्डिंग की भव्य दीवारें थरथरा गयीं कुबेर भगवान की मूर्ति ने तो अदृश्य होने का ही मन बना लिया था। मंत्री जी ने ज्ञान दिया था कि खादी की दुर्दशा से लेकर नोट की दुर्दशा तक गांधीजी का नाम और फोटो जिम्मेदार है। इस मौलिक ज्ञान का झटका अनेक पूर्व वित्तमंत्रियों और RBI गवर्नरों को जरूर लगा होगा कि यह ज्ञान पहले क्यों नहीं मिला। झटका तो भाजपा को भी दिल्ली से लेकर लगा हरयाणा तक लगा लेकिन मंत्री जी ने तटस्थता से ज्ञान को बयान बताकर वापस ले लिया। अब यह कहाँ से कितना वापस गया जनता को समझ नहीं आया।
मूलतः हरयाणा से होने के कारण मैं हरयाणा ब्रिगेड की ज्ञानदायिनी सलाहियत से पूर्णतः वाकिफ़ रहा हूँ। हरयाणा वाले ज्ञान लेते नहीं पर मौलिक ज्ञान की सप्लाई जरूर कर देते हैं। विश्वास ना हो तो अपने दिल्ली वाले माननीय मफ़लर मैन महोदय को ही देख लीजिये वो भी मूलतः हरयाणा से हैं और भारतीय राजनीती में कुटाई और स्याही की महिमा का जो सात्विक ज्ञान उन्होंने दिया है उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती। ऐसा ही ज्ञान मफ़लर बाबू साल के पहले दिन रोहतक में में दे रहे थे इससे युग नायक श्री केजरी महाराज का एक हरयाणवी भक्त इतना अभिभूत हुआ कि जवाब में उनको जूते से ज्ञान सप्लाई कर डाला। युग नायक ने तत्काल कह दिया यह भक्त मेरा नहीं मोदी का है। दरअसल भक्त का निशाना चूक गया था और केजरी बाबू को अपने भक्तों पर पूरा विश्वास है कि उनका निशाना नहीं चूकता। अब दिल्ली वाले भक्त ऑटो ड्राइवर लाली भाईसाब का ही उदाहरण देखिये क्या निशाना ताक कर उन्होंने सत्याग्रही तमाचे का ज्ञान दिया था अगले ही घण्टे में में परिवर्तन की राजनीती में व्यस्त आपई महकमा राजघाट पर बैठा नजर आया था।
वैसे साल की शुरुआत में युगनायक केजरी अकेले नहीं थे जो ज्ञान का विमोचन करते नजर आए उधर दूर कर्नाटक के गृहमंत्री बंगलोर में छेड़छाड़ की घटना से इतने द्रवित हुए उनके अंदर बैठे विवेचक ने तत्काल घटना की वजह की जाँच कर पाया कि शराब पीकर हुड़दंग मचा रहे पुरुष मासूम थे और छिड़ने वाली महिलाओं का दोष था कि उन्होंने त्वचा प्रदर्शक वस्त्र धारण किये थे। समस्या सामाजिक है सो अगले ही दिन घटना का समाजवादीकरण हो गया। मुम्बई से अबु आज़मी ने संत मुद्रा धारण कर घटना का एक्सप्लेनेशन सोदाहरण दिया। संत आज़मी जी ने समझाया कि महिलायें शकर हैं और पुरुष चींटियां इसलिये शकर पर चींटियों के आने की प्रक्रिया सहज समझकर तूल न दिया जाये। अबु आज़मी जी ने यह भी समझाया आग को पेट्रोल दिखाओगे तो आग लगेगी ही। यहाँ मुझे थोड़ा तकनीकी कन्फ्यूज़न हो गया। इसमें आग कौन है और पेट्रोल कौन है। अगर महिलाएं आग हैं तो पुरुष पेट्रोल हो न हो क्या फ़र्क पड़ता है आग तो है ही और अगर पुरुष आग हैं तो महिलाएं पेट्रोल हों ना हों क्या फर्क पड़ा। अबु आज़मी कुछ अनर्गल संत निकले।
मैंने इस समाजवादी व्याख्यान की तकनीकी दिक्कत के निराकरण के लिए समाजवादी हैडक्वार्टर की ओर दृष्टिपात किया तो समाजवादी हैडक्वार्टर गम्भीर मुद्रा में चुनाव आयोग को साईकिल के तकनीकी पक्ष समझाता नजर आया। हैडक्वार्टर के चेहरे की गम्भीरता देखते हुए मैंने उधर से चुपचाप निकल लेना ही उचित समझा। अब मुझे नया ज्ञान प्राप्त हुआ....... "भय ज्ञान की उतपत्ति का प्रमुख कारण है" अपनी फजीहत से बचने को भी व्यक्ति मौन रहना श्रेयस्कर समझता है। इसके अलावा मैं पर्सनैलिटी डेवलपमेंट के उस शिक्षक की बात से पूरी तरह सहमत हूँ जिसने ज्ञान में भारी पड़ने पर अपने छात्रों को को समझाया था कि "ज्ञान अधोवस्त्रों की तरह होता है प्रदर्शन की अपेक्षा इसका धारण करना श्रेयस्कर है। अब ये बात अपने नेताओं को कौन समझाये।
दरअसल भारत ज्ञान प्रधान देश है। भले हमारे पास करने को काम न हो खाने को रोटी न हो बाँटने को ज्ञान भरपूर है और यह काम हम पूरी निष्ठा से करते आये हैं। वैदिक काल में ज्ञान देने का काम ऋषि मुनि लोग किया करते थे वर्तमान युग में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। कौन कब कहाँ से ज्ञान ठेल जाये पता नहीं चलता। बाहर तो छोड़िये घर में बैठे आदमी पर भी पत्नि बच्चे ज्ञान ठेलना शुरू कर देते हैं इन सब से बच बचा कर सोशल मीडिया या टीवी की शरण में चला गया तो ज्ञान की मिक़दार कई गुना बढ़ जाती है। कल मेरे साथ ऐसा ही हुआ। हुआ यूँ कि टीवी ऑन ही किया था कि विज मंत्री गाँधी दर्शन पर "व्यक्तिगत" ज्ञान देते नजर आये। ज्ञान इतना मौलिक था कि इसे सुनकर RBI बिल्डिंग की भव्य दीवारें थरथरा गयीं कुबेर भगवान की मूर्ति ने तो अदृश्य होने का ही मन बना लिया था। मंत्री जी ने ज्ञान दिया था कि खादी की दुर्दशा से लेकर नोट की दुर्दशा तक गांधीजी का नाम और फोटो जिम्मेदार है। इस मौलिक ज्ञान का झटका अनेक पूर्व वित्तमंत्रियों और RBI गवर्नरों को जरूर लगा होगा कि यह ज्ञान पहले क्यों नहीं मिला। झटका तो भाजपा को भी दिल्ली से लेकर लगा हरयाणा तक लगा लेकिन मंत्री जी ने तटस्थता से ज्ञान को बयान बताकर वापस ले लिया। अब यह कहाँ से कितना वापस गया जनता को समझ नहीं आया।
मूलतः हरयाणा से होने के कारण मैं हरयाणा ब्रिगेड की ज्ञानदायिनी सलाहियत से पूर्णतः वाकिफ़ रहा हूँ। हरयाणा वाले ज्ञान लेते नहीं पर मौलिक ज्ञान की सप्लाई जरूर कर देते हैं। विश्वास ना हो तो अपने दिल्ली वाले माननीय मफ़लर मैन महोदय को ही देख लीजिये वो भी मूलतः हरयाणा से हैं और भारतीय राजनीती में कुटाई और स्याही की महिमा का जो सात्विक ज्ञान उन्होंने दिया है उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती। ऐसा ही ज्ञान मफ़लर बाबू साल के पहले दिन रोहतक में में दे रहे थे इससे युग नायक श्री केजरी महाराज का एक हरयाणवी भक्त इतना अभिभूत हुआ कि जवाब में उनको जूते से ज्ञान सप्लाई कर डाला। युग नायक ने तत्काल कह दिया यह भक्त मेरा नहीं मोदी का है। दरअसल भक्त का निशाना चूक गया था और केजरी बाबू को अपने भक्तों पर पूरा विश्वास है कि उनका निशाना नहीं चूकता। अब दिल्ली वाले भक्त ऑटो ड्राइवर लाली भाईसाब का ही उदाहरण देखिये क्या निशाना ताक कर उन्होंने सत्याग्रही तमाचे का ज्ञान दिया था अगले ही घण्टे में में परिवर्तन की राजनीती में व्यस्त आपई महकमा राजघाट पर बैठा नजर आया था।
वैसे साल की शुरुआत में युगनायक केजरी अकेले नहीं थे जो ज्ञान का विमोचन करते नजर आए उधर दूर कर्नाटक के गृहमंत्री बंगलोर में छेड़छाड़ की घटना से इतने द्रवित हुए उनके अंदर बैठे विवेचक ने तत्काल घटना की वजह की जाँच कर पाया कि शराब पीकर हुड़दंग मचा रहे पुरुष मासूम थे और छिड़ने वाली महिलाओं का दोष था कि उन्होंने त्वचा प्रदर्शक वस्त्र धारण किये थे। समस्या सामाजिक है सो अगले ही दिन घटना का समाजवादीकरण हो गया। मुम्बई से अबु आज़मी ने संत मुद्रा धारण कर घटना का एक्सप्लेनेशन सोदाहरण दिया। संत आज़मी जी ने समझाया कि महिलायें शकर हैं और पुरुष चींटियां इसलिये शकर पर चींटियों के आने की प्रक्रिया सहज समझकर तूल न दिया जाये। अबु आज़मी जी ने यह भी समझाया आग को पेट्रोल दिखाओगे तो आग लगेगी ही। यहाँ मुझे थोड़ा तकनीकी कन्फ्यूज़न हो गया। इसमें आग कौन है और पेट्रोल कौन है। अगर महिलाएं आग हैं तो पुरुष पेट्रोल हो न हो क्या फ़र्क पड़ता है आग तो है ही और अगर पुरुष आग हैं तो महिलाएं पेट्रोल हों ना हों क्या फर्क पड़ा। अबु आज़मी कुछ अनर्गल संत निकले।
मैंने इस समाजवादी व्याख्यान की तकनीकी दिक्कत के निराकरण के लिए समाजवादी हैडक्वार्टर की ओर दृष्टिपात किया तो समाजवादी हैडक्वार्टर गम्भीर मुद्रा में चुनाव आयोग को साईकिल के तकनीकी पक्ष समझाता नजर आया। हैडक्वार्टर के चेहरे की गम्भीरता देखते हुए मैंने उधर से चुपचाप निकल लेना ही उचित समझा। अब मुझे नया ज्ञान प्राप्त हुआ....... "भय ज्ञान की उतपत्ति का प्रमुख कारण है" अपनी फजीहत से बचने को भी व्यक्ति मौन रहना श्रेयस्कर समझता है। इसके अलावा मैं पर्सनैलिटी डेवलपमेंट के उस शिक्षक की बात से पूरी तरह सहमत हूँ जिसने ज्ञान में भारी पड़ने पर अपने छात्रों को को समझाया था कि "ज्ञान अधोवस्त्रों की तरह होता है प्रदर्शन की अपेक्षा इसका धारण करना श्रेयस्कर है। अब ये बात अपने नेताओं को कौन समझाये।