Sunday, 15 January 2017

भय ज्ञान की उतपत्ति का प्रमुख कारण है

गलती सरासर मेरी थी। ट्विटर पर कहता रहा यह ब्लॉग हल्के फुल्के मूड़ में रोजमर्रा टाइप के पठन पाठन के लिए रख छोड़ा है लेकिन ब्लॉग में स्पष्ट नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि मेरे कुछ मित्र मेरी निठल्लेपन की लफ्फाजी में गहन साहित्य ढूंढने का प्रयास करते रहे पर साहित्य न तो था न मित्र पाठकों को मिला। इससे नाराज होकर उन्होंने समीक्षक का रूप धारण कर लिया और कह दिया कुछ लिखने से रह गया है या दो अलग अलग कहानी हैं। क्या बताऊं कि यह कहानी है ही नहीं और जब मेरे पास लिखने को ही कुछ नहीं था तो छोड़ने को क्या होता। खैर मैं उनका शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने सरसरी पोस्ट में गहन मगजपच्ची की। मित्रों के समीक्षक होने पर मैं भले शंकित हूँ उनके ज्ञान पर मुझे कोई संदेह नहीं है।

दरअसल भारत ज्ञान प्रधान देश है। भले हमारे पास करने को काम न हो खाने को रोटी न हो बाँटने को ज्ञान भरपूर है और यह काम हम पूरी निष्ठा से करते आये हैं। वैदिक काल में ज्ञान देने का काम ऋषि मुनि लोग किया करते थे वर्तमान युग में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। कौन कब कहाँ से ज्ञान ठेल जाये पता नहीं चलता। बाहर तो छोड़िये घर में बैठे आदमी पर भी पत्नि बच्चे ज्ञान ठेलना शुरू कर देते हैं इन सब से बच बचा कर सोशल मीडिया या टीवी की शरण में चला गया तो ज्ञान की मिक़दार कई गुना बढ़ जाती है। कल मेरे साथ ऐसा ही हुआ। हुआ यूँ कि टीवी ऑन ही किया था कि विज मंत्री गाँधी दर्शन पर "व्यक्तिगत" ज्ञान देते नजर आये। ज्ञान इतना मौलिक था कि इसे सुनकर RBI बिल्डिंग की भव्य दीवारें थरथरा गयीं कुबेर भगवान की मूर्ति ने तो अदृश्य होने का ही मन बना लिया था। मंत्री जी ने ज्ञान दिया था कि खादी की दुर्दशा से लेकर नोट की दुर्दशा तक गांधीजी का नाम और फोटो जिम्मेदार है। इस मौलिक ज्ञान का झटका अनेक पूर्व वित्तमंत्रियों और RBI गवर्नरों को जरूर लगा होगा कि यह ज्ञान पहले क्यों नहीं मिला। झटका तो भाजपा को भी दिल्ली से लेकर लगा हरयाणा तक लगा लेकिन मंत्री जी ने तटस्थता से ज्ञान को बयान बताकर वापस ले लिया। अब यह कहाँ से कितना वापस गया जनता को समझ नहीं आया।

मूलतः हरयाणा से होने के कारण मैं हरयाणा ब्रिगेड की ज्ञानदायिनी सलाहियत से पूर्णतः वाकिफ़ रहा हूँ। हरयाणा वाले ज्ञान लेते नहीं पर मौलिक ज्ञान की सप्लाई जरूर कर देते हैं। विश्वास ना हो तो अपने दिल्ली वाले माननीय मफ़लर मैन महोदय को ही देख लीजिये वो भी मूलतः हरयाणा से हैं और भारतीय राजनीती में कुटाई और स्याही की महिमा का जो सात्विक ज्ञान उन्होंने दिया है उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती। ऐसा ही ज्ञान मफ़लर बाबू साल के पहले दिन रोहतक में में दे रहे थे इससे युग नायक श्री केजरी महाराज का एक हरयाणवी भक्त इतना अभिभूत हुआ कि जवाब में उनको जूते से ज्ञान सप्लाई कर डाला। युग नायक ने तत्काल कह दिया यह भक्त मेरा नहीं मोदी का है। दरअसल भक्त का निशाना चूक गया था और केजरी बाबू को अपने भक्तों पर पूरा विश्वास है कि उनका निशाना नहीं चूकता। अब दिल्ली वाले भक्त ऑटो ड्राइवर लाली भाईसाब का ही उदाहरण देखिये क्या निशाना ताक कर उन्होंने सत्याग्रही तमाचे का ज्ञान दिया था अगले ही घण्टे में में परिवर्तन की राजनीती में व्यस्त आपई महकमा राजघाट पर बैठा नजर आया था।

वैसे साल की शुरुआत में युगनायक केजरी अकेले नहीं थे जो ज्ञान का विमोचन करते नजर आए उधर दूर कर्नाटक के गृहमंत्री बंगलोर में छेड़छाड़ की घटना से इतने द्रवित हुए उनके अंदर बैठे विवेचक ने तत्काल घटना की वजह की जाँच कर पाया कि शराब पीकर हुड़दंग मचा रहे पुरुष मासूम थे और छिड़ने वाली महिलाओं का दोष था कि उन्होंने त्वचा प्रदर्शक वस्त्र धारण किये थे। समस्या सामाजिक है सो अगले ही दिन घटना का समाजवादीकरण हो गया। मुम्बई से अबु आज़मी ने संत मुद्रा धारण कर घटना का एक्सप्लेनेशन सोदाहरण दिया। संत आज़मी जी ने समझाया कि महिलायें शकर हैं और पुरुष चींटियां इसलिये शकर पर चींटियों के आने की प्रक्रिया सहज समझकर तूल न दिया जाये। अबु आज़मी जी ने यह भी समझाया आग को पेट्रोल दिखाओगे तो आग लगेगी ही। यहाँ मुझे थोड़ा तकनीकी कन्फ्यूज़न हो गया। इसमें आग कौन है और पेट्रोल कौन है। अगर महिलाएं आग हैं तो पुरुष पेट्रोल हो न हो क्या फ़र्क पड़ता है आग तो है ही और अगर पुरुष आग हैं तो महिलाएं पेट्रोल हों ना हों क्या फर्क पड़ा। अबु आज़मी कुछ अनर्गल संत निकले।

मैंने इस समाजवादी व्याख्यान की तकनीकी दिक्कत के निराकरण के लिए समाजवादी हैडक्वार्टर की ओर दृष्टिपात किया तो समाजवादी हैडक्वार्टर गम्भीर मुद्रा में चुनाव आयोग को साईकिल के तकनीकी पक्ष समझाता नजर आया। हैडक्वार्टर के चेहरे की गम्भीरता देखते हुए मैंने उधर से चुपचाप निकल लेना ही उचित समझा। अब मुझे नया ज्ञान प्राप्त हुआ....... "भय ज्ञान की उतपत्ति का प्रमुख कारण है" अपनी फजीहत से बचने को भी व्यक्ति मौन रहना श्रेयस्कर समझता है। इसके अलावा मैं पर्सनैलिटी डेवलपमेंट के उस शिक्षक की बात से पूरी तरह सहमत हूँ जिसने ज्ञान में भारी पड़ने पर अपने छात्रों को को समझाया था कि "ज्ञान अधोवस्त्रों की तरह होता है प्रदर्शन की अपेक्षा इसका धारण करना श्रेयस्कर है। अब ये बात अपने नेताओं को कौन समझाये। 

Monday, 9 January 2017

बेवजह की चर्चा

पहाड़ों में भारी बर्फबारी के बाद उधर से आती हवाओं ने मौसम कुछ ठंडा तो किया है। इधर भी सर्दी के ऐहसास ने चेहरों पर मुस्कान बिखेरी है। महिलाओं के सौंदर्य में सर्दी का मौसम हमेशा वृद्धि करता है यह भी एक अनुभव है जो सर्दियों की शाम उत्तर भारत के बाजारों में सहज अनुभव किया जा सकता है।

मेरी आदत ठंड को ठंड सा अनुभव करने की रही है सो जब तापमान 0 डिग्री से 12 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है मुझे मौसम अच्छा लगता है। हालाँकि मौसम अभी उतना सर्द हुआ नहीं है। जब हो जायेगा तब बेडरूम में 200 वाट का बल्ब लगा लूंगा। हीटर की तेज गर्मी सहन नहीं होती। जरूरत भी क्या है सर्दी को दोबारा गर्म करने की इसलिए कमरे में 3 या चार घण्टे जला बल्ब ही सुखद लगता है। एल ई डी लाइट्स के युग में झमाझम चमकती बल्ब की रौशनी कुछ अजीब लगती तो है लेकिन यदि साथ ही एल ई डी लाइट भी ऑन रखें तो सुनहरी सफ़ेद चमक सुखदायी है।

सम्बंधों पर जमी बर्फ़ के इलाज इतने आसान नहीं होते। जाने कैसे कब किस सम्बंध पर धीरे धीरे बर्फ़ की मोटी परत जम जाये कहा नहीं जा सकता। फिर यह परत न टूटती है न ही इसे तोड़ने इच्छा रह जाती है। यदि सम्बंधों पर जमी ठंडी परत टूट भी जाये तो बर्फ़ पर चटक सी लकीरें जैसे स्थायी हो जाती हैं। और जो इसे पिघला सके ऐसी आँच राख हुए रिश्तों में रहती नहीं।

दरअसल सम्बंधों का रख रखाव न तो कोई विज्ञान है न ही कला। यह नैसर्गिक अनुभव है जनित आवश्यकता है जो तत्काल होती है स्थायी होती है और शाश्वत है। यदि ऐसा नहीं है तो सम्बंध गैरजरूरी परिपाटी की तरह भी चलते जाते हैं जिनमे न सुखद शीतलता होती है न ज्वलंत आँच बस सम्बंध होते हैं क्योंकि वे कभी किसी कारणवश बन गए थे। कुछ सम्बंध दोस्ती या दुश्मनी के हम पिछले जन्मों से भी उठा लाते हैं लेकिन उनका होना सामान्य व्यवहार और जीवन में संभव नहीं होता।

ऐसे में यही कहूंगा कि किन्हीं सम्बंधों पर गर्व या अफ़सोस या शर्मिंदगी से बेहतर है उन्हें जस का तस आत्मसात कर लें। सम्बंधों के होने या ना होने की कला या विज्ञान पर समय लगाएंगे तो व्यर्थ ही होगा। सम्बंध अच्छे या बुरे क्षणिक या स्थायी व्यक्ति की सामर्थ्य से बाहर हैं।  

Monday, 2 January 2017

गर्मा गर्म साल मुबारक


                                             



दोस्तों नया साल मुबारक। मुबारकबाद देते हुए सोच रहा हूँ कि किस बात की  मुबारकबाद ज्यादा  मौंजू रहेगी, गर्म जनवरी की या 50 दिन गुजरने की या पूरे 365 दिन गुजरने की।  बहरहाल 2016 ने 2017 में प्रवेश किया तो नया साल मुबारक।

वैसे  सर्दियों में गर्मी की शुरुआत तो दीवाली के बाद ही शुरू हो गयी थी जब आला हजरत ने काली क्रय शक्ति पर गर्मी दिखाते हुए नोटबंदी की घोषणा कर डाली कुछ दिन तक यह गर्मी सरकार और पार्टी में दिखाई देती रही फिर गर्मी नवयुवा प्रौढ़ युवराज में जा पहुँची लगे एटीम और बैंकों के चक्कर काटने युवराज की गर्मी धीरे धीरे बढ़ती गयी पर मजाल हो जो सरकार ने कांग्रेस सरकार की बात पर ध्यान दिया हो।  अपनी गर्मी की इस अनदेखी से बाबा भाई युवराज इतने नाराज हो गए कि 2016 की गर्मी कम करने किसी ठंडे देश चले गए।

जनता थोड़ा बाद में गर्मी में आयी लेकिन बेचारी साधारण जनता अपने को जनार्दन समझ कर गरमा गयी थी सो पुलिस की गर्मी ने जनता का भ्रम तोड़ कर ठंडा कर दिया।  गर्मायी तो चप्पल वाली दीदी भी थीं और बहुत गरमायीं, दिल्ली  के मर्यादा पुरुषोत्तम मफलर हाकिम से लगाकर बाबा युवराज तक सब दीदी की गर्मी से अपने हुक्कों में आग भरने लगे लेकिन बुरा हो धूलगढ़ के अमन प्रेमियों का जो फ़िलहाल नोटबंदी को जुबान बंदी तक खींच ले आये। बिहारी बाबू भी कुछ काम न आये।

गर्मी की गहमा गहमी यूपी पहुँची तो दिल्ली के करोलबाग के बैंक में ऐसी उठापटक जाहिर हो गयी कि यूपी की बहनजी की आक्रामकता रक्षात्मक होकर मोर्चे से सरक गयी, लेकिन इसी बीच समाजवाद इतना गरमाया कि लखनऊ से दिल्ली के निर्वाचन सदन तक समाजवाद ही समाजवाद तपता हुआ नजर आ रहा है। पर इस बीच सरकारी गर्मी कुछ ठंडी हुई दीख पड़ती है,  आला हजरत की नव वर्ष की बधाई से कुछ ऐसा ही लगा। खैर जी ये बड़े लोगों और जनार्दन, जिसे चुनाव के बाद महज जनता का ही दर्जा हासिल होता है, के बीच का मामला है जैसे तैसे सुलट ही लेंगे।

असल में इस गर्म सर्दी से कोई दिक्कत है तो मुझे है। प्रिय पत्नि ने अक्टूबर से पहले ही ठंड में मुझ तक गरमाई पहुँचाने के उद्देश्य से जो खूबसूरत रजाई बनवाई थी बेड पर सजी हुई है कभी ओढ़ता हूँ तो कभी फेंकता हूँ लेकिन बेड पर सजी रजाई के फ़ोटो खेंच कर पत्नि को भेजता रहता हूँ जिससे कम से कम उसे तो तसल्ली रहे। गर्म सर्दी के कारण चिड़ियों को भी हर जगह खाना उपलब्ध है तो जो दाने का भंडार मैंने उनके लिए लाकर रखा है वह भी कम ही खर्च हो रहा है। इसी कारण सामाजिकता पर असर यह हुआ कि अलाव जलाकर राजनितिक चर्चाएं जो इस दौर में सुनने को मिल जाती थीं उनका आभाव है। कुत्ते अभी तक नवंबर के धोखे में सारी रात रोते हैं और बस रोते ही रह जाते हैं। माहौल है कि नोटबंदी की कड़की के बावजूद खुशगवार चल है गाजर का हलवा मजेदार नहीं लगता रस्मअदायगी भर रह गया है ब्रांडी की तरफ़ देखने का मन नहीं होता। ऐसे ठिठुरन वाली तेज सर्दी को याद करता रहता हूँ। बारिश ही आ जाये तो कोई तो बदलाव महसूस हो यूँ तो 16 का 17 हो जाना बड़ा नीरस है। इसी नीरसता के बीच से नए साल की गरमागरम मुबारकबाद।