Thursday, 6 September 2018

भगवा की दरकती दीवार

वर्तमान राजनितिक घटनाक्रम से गुजरते पिछले दिनों से स्पष्ट दीखने लगा था कि आने वाले समय में मोदी सरकार के विरुद्ध देश भर में एक विशेष प्रकार के असंतोष का माहौल बनने जा रहा है जो प्रकृति में लगभग वही होगा जो 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन के समय कांग्रेस के नेतृत्व वाली 'यूपीए' सरकार के विरुद्ध बन गया था। इस तथ्य से समस्त मीडिया कितना अवगत था कह नहीं सकते लेकिन सोशल मीडिया पर प्रभंजन के रव को सहज महसूस किया जा सकता था किंतु सोशल मीडिया बहादुर भाजपा, अति आत्ममविश्वास की अफ़ीम के उनींदेपन में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के विरुद्ध पनप रहे असंतोष को पहचानने में असफल रही। परिणाम आज सामने आने लगा है।

सवर्णों का भारत बंद वर्तमान में भले SC/ST एक्ट के विरुद्ध एक सहज प्रतिक्रिया सा दीख पड़ता है लेकिन इसे यहीं तक समझना एक बड़ी भूल होगी। SC/ST एक्ट तो सुप्रीम कोर्ट का संशोधन करने वाला फैसला आने से पहले भी यही था फिर सवर्ण या ओबीसी वर्ग लगभग तीन दशकों से क्यों चुप बैठे थे क्यों इसके विरुद्ध कोई आंदोलन नहीं हो रहा था ? यह सच है कि SC/ST एक्ट का दुरूपयोग बहुत जबरदस्त तरीके से होता रहा था और इसके उपयोग को ही बंद करने की बात कह कर एक बार मुलायम सिंह उत्तरप्रदेश की सत्ता में आये थे और दूसरी बार बसपा सुप्रीमो मायावती ने मुख्यमंत्री बनने के बाद इसके दुरूपयोग को रोकने के लिए लिखित आदेश दिए थे लेकिन यह भी भी सच है कि इसका विरोध भारतीय राजनीती का मुख्य मुद्दा कभी नहीं बना।

दरअसल आज का जो सवर्ण विरोध दीख रहा है वह मूलतः सवर्णों का दलित एक्ट विरोध न होकर वह जनअसंतोष है जो मोदी सरकार के विरोध में पिछले समय आम जनता या जिसे हम मध्यम वर्ग के नाम से जानते हैं, में पनप रहा है। और यह विरोध उसी वर्ग का असंतोष है जिसने बड़े उत्साह और अरमानों से नरेंद्र मोदी को भारत के प्रधानमंत्री के रूप में सत्तारूढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसमें सवर्ण हैं पिछड़ा वर्ग है राष्ट्रवादी हैं हिंदुत्ववादी हैं। आज यही वर्ग भाजपा सरकार द्वारा खुद को ठगा गया महसूस कर रहा है।

भाजपा को प्रचंड बहुमत देकर सरकार में लाने वाले इस वर्ग ने जिन मुद्दों पर वोट दिया था वह मुद्दे थे ; राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, पेट्रोल डीज़ल की बढ़ती कीमतें, महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीती से मुक्ति, कश्मीर समस्या का समाधान, धारा 370 का खात्मा, रोज भारतीय सैनिकों की लाशें भेज रहे पाकिस्तान का स्थायी इलाज, कॉमन सिविल कोड, राम मंदिर का निर्माण। ये सब वही मुद्दे हैं जो हमेशा भाजपा के भी मुद्दे रहे हैं। इन्हीं मुद्दों पर विजय पाने के लिए जनता ने अभूतपूर्व उत्साह से 30 साल बाद पूर्ण बहुमत की समर्थ सरकार को गद्दीनशीन किया था। सरकार के प्रारम्भिक डेढ़ दो वर्ष में इनमें से कुछ मुद्दों पर कुछ काम होता लगा भी किंतु अंततः वह सब कहीं पहुँचता नहीं दिखा बल्कि जनता इन मुद्दों पर सरकार की न समझ आने वाली नीतियों पर असमंजस में नजर आने लगी।

हुआ यह कि राष्ट्रवाद ट्विटर, फेसबुक की मीडिया सेल और अंधभक्तों का मसला बनकर रह गया जिन्होंने उसे  गालियों का राष्ट्रवाद बना दिया, कच्चे तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक तिहाई रह जाने के बावजूद आम जनता को एक पैसे की राहत न दी गयी, भ्रष्टाचार सरकार के स्तर पर खत्म हुआ लेकिन सरकारी अधिकारी कर्मचारियों के स्तर पर कोई फर्क नहीं पड़ा, आतंकवाद उरी से पठानकोट तक सैन्य लाइन्स में जा घुसा जहाँ सैनिकों की शहादतें होती रहीं, कश्मीर में तो आतंकवाद की हमदर्द मुफ़्ती महबूबा के साथ भाजपा उस सत्ता का सुख लेने में लग गयी जो देश को खोखला कर रही थी आतंक के साये में रोज सैनिकों/सुरक्षा बलों की लाशें उठा रही थी और जनता के रोष, आक्रोश के बावजूद तीन साल इस सत्ता सुख पर काबिज रही। धारा 370 तो खैर क्या हटाते उलटे इनकी मुख्यमंत्री 35 A जैसे असंवैधानिक आर्टिकिल पर भारतीय राष्ट्र को धमकाती रही कि कश्मीर में तिरंगे को कंधा देने वाला नहीं मिलेगा।

उधर पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक का अगर कोई असर पड़ सकता था तो उसे केजरीवाल और कांग्रेस के नेताओं ने 'फर्जीकल स्ट्राइक' कह कर, सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठा कर न्यूट्रेलाईज़ कर दिया और पाकिस्तान को मौका दे दिया कि वह पहले की तरह अपने नापाक मंसूबों को परवान चढ़ाता रहे।

मुस्लिम तुष्टिकरण से मुक्ति दिलाने आये साहब लोग कुछ समय तो चुप रहे और इस चुप्पी का ही असर था कि खुद मुसलमान उलेमा आतंकवादियों के विरुद्ध फतवे देते नजर आये, लेकिन उसके बाद हुआ यह कि खुद प्रधानमंत्री मुहम्मद साहब की अर्चना और कुरान की बातों में लग गए इतना ही नहीं बल्कि संघ, जिससे कभी तुष्टिकरण की राजनीती पर सहानुभूति दिखाने की अपेक्षा कर ही नहीं सकते थे वह भी सरयू के किनारे नमाज पढ़ाने की योजना बनाने लगा। वह तो संत समाज का तीखा विरोध था जो 'संघ नमाज योजना' परवान न चढ़ सकी।  इस नव तुष्टिकरण का सबसे घातक परिणाम यह हुआ कि अतिवादी मुसलमान मुफ़्ती मौलाना भारत के और टुकड़े करने, एक और अलग मुस्लिम देश की मांग करने लगे। अधिक कष्ट की बात ये है कि ऐसा सिर्फ कश्मीर में नहीं आपके टीवी चैनलों की डेली डिबेट्स में भी होने लगा।

राम मंदिर बनाने की बात तो खैर भूल ही जाइये वह तो अदालत के निर्णय के नाम पर पड़ा रहेगा और अदालत तो लगता नहीं हमारे जीवनकाल में कोई फ़ैसला देगी। कॉमन सिविल कोड के बारे में तो लॉ कमीशन को ही लगने लगा है कि इसकी कोई जरूरत नहीं। हालाँकि भाजपा सरकार मुस्लिम महिलाओं को 'न्याय दिलाने' की टीवी डिबेट्स में अति उत्साहित लगती है। अब इन मुद्दों के साथ हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, देशभक्ति, राम मंदिर जैसे  अन्य मुद्दों पर भाजपा को सत्ता में लाया साधारण वर्ग का आम आदमी सोच रहा है कि जिन कारणों से मैं इस सरकार को लाया उनका क्या हुआ ? आम देशवासी का सोचना है कि अभी तक साबित व्यर्थ की नोटबंदी और कष्टकारी जीएसटी को सहन कर मैंने जो देश भर में भगवा लहरा दिया था उस से मुझे क्या हासिल हुआ ?

अब आकर तो जनसाधारण को इस सरकार की उसको कुछ न देने की नीयत पर ही शक़ होने लगा है। उज्ज्वला योजना, 18000 गांवों की बिजली 6 करोड़ शौचालयों से, आम शहरी मध्यम वर्ग जो अधिकांशतः सवर्ण तथा सो काल्ड पिछड़े वर्गों से बनता है, उसको क्या हासिल हुआ ? यहाँ आकर भाजपा सरकार पूरी तरह विफ़ल हुई और बजाय इस वर्ग के असंतोष को दूर करने के प्रवक्ताओं के टीवी डिबेट्स के सहारे चुनाव जीतने के मंसूबे बांधे बैठी है। 2014 में समस्त जातियों को एकत्र कर हिंदुत्व के एक सूत्र में पिरोने वाली भाजपा जातियों की माइक्रो इंजीनियरिंग में इस कदर मुब्तिला हो गयी कि हिंदुओं को फिर से जातियों में बाँट दिया। यह भाजपा की भयानक भूल रही जो अतरिक्त चतुराई में की गयी लगती है।

हिंदुओं के एकीकरण से भारत का जो नक्शा भगवा होता चला जा रहा था उसको जातियों में बाँटकर और वर्गों में वंचना का भाव पैदा कर भाजपा सरकार ने ही भगवा किले की दीवार को दरका दिया है। चार सालों से दलित शोषित पीड़ित वंचित किसान सुनता मध्यम वर्ग असंतुष्ट है क्योंकि महसूस करने लगा है कि इस जुमलेबाजी में मैं कहाँ हूँ। यह वह असंतोष है जिसमें संसद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलने की कार्यवही ने चिंगारी दिखा कर विस्फोट करा दिया है। अब इस सरकार विरोधी सामाजिक उथलपुथल और आंदोलित मानस का लाभ लेने विपक्षी दल भी मैदान में उतर आये हैं जो भले अपने पक्ष में माहौल न बना पायें लेकिन भाजपा की भगवा किले की दीवार कमजोर कर ही देंगे। कुछ हिंदुत्ववादी  तो कहने भी लगे हैं कि 2019 में यदि दो ढाई साल के लिए कमजोर सरकार आ भी गयी तो कोई मुस्लिम राष्ट्र तो घोषित कर नहीं देगी। ढाई वर्षों में फिर सरकार बदल देंगे लेकिन इनकी राजनीती ठीक करना जरूरी हो गया है।

अगले माह अन्ना हजारे आरक्षण विरोधी आंदोलन लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान में बैठने वाले हैं। भले अन्ना हजारे से सहानुभूति न हो लेकिन अपने सरोकारों के चलते सामान्य मध्यम वर्ग और पिछड़ा वर्ग भी उस आंदोलन में भाग लेगा इसी तरह मजदूरों का भी आंदोलन अगले माह है। कुछ अन्य दलों के छोटे बड़े अनेक राजनीतिक आंदोलन इसी का लाभ लेकर शुरू कर दिए जाने की अपेक्षा की जा सकती है। स्पष्ट नजर आ रहा है कि भाजपा आने वाले समय में उसी स्थिति से दो चार होने वाली है जो यूपीए सरकार ने अपने अंतिम वर्ष में देखी थी। लेकिन आम आदमी को कुछ न देने की नीयत के चलते भाजपा  वर्तमान स्थिति से जीत पाने में असमर्थ नजर आती है क्योंकि इतना समय निकाल दिया गया है कि अब इनकी जीतने की योग्यता पर ही संदेह होने लगा है। नवंबर में आने वाले विधानसभा चुनावों में भगवा नक्शे के बीचों बीच कमजोरी के कारण बड़े छेद होने की आशंका नजर आती है। 

Monday, 15 January 2018

मन की बात

मन की बात

                 


                           तुम्हारे पांवों के नीचे कोई जमीन नहीं 


ठहरते चलते  समय के साथ जाने कितना ठहरते जाने कितना चलते हम इतने सामाजिक तो हो गये हैं कि व्यक्ति को उसकी पीड़ा और निराशाओं के बीच घुटता हुआ छोड़ दिया है, मौन और अकेला। वही व्यक्ति जो जन्म से ही हमारे भीतर था जो हमारे साथ बड़ा हुआ जो स्वप्नदृष्टा था, रूमानी था जीवित भी था, तब तक जब तक कि हम दुनियादार नहीं हो गए। अब वही व्यक्ति भीतर ही भीतर तड़पता है चीखता है चुनौती देता है लेकिन हम मौन हैं, खुश हैं क्योंकि हम प्रतिक्रिया नहीं करते हमारी अभिव्यक्ति रुंध गयी है। दरअसल दुनियादार आदमी अभिव्यक्ति, रुमानियत और व्यक्तित्व के अंत का कब्रिस्तान है जहाँ सारी कब्रें सीमेंटेड हैं सभी एकरंग पुती हुई जिसके अभिशाप में व्यक्ति की अभिव्यक्ति और प्रतिक्रियाएं एकरस हैं। 


लोग अपने कष्टों कुंठाओं और निराशाओं को व्यक्त नहीं करते अभावों को भी नहीं भावों को भी नहीं। स्थिर सुख के नपे तुले भावों के साथ हर चेहरा नयी सभ्यता का अनजान वाहक बना नजर आता है जिसके पास पाने के लिए पूरा बाजारवाद है और खोने के लिए एक व्यक्ति ही था जिसे वह पहले ही दफ़ना आया है बिना इस बात की परवाह किये कि वह जीवित था या मृत। वह इस बात से भी चिंतित नहीं है कि कहीं भविष्य में उसके भीतर दफ़्न यही आदमी कभी बाहर निकल आया तो कैसे हैंडल करेंगे ? क्या फिर एक हत्या होगी ? दुनियादार आदमी इस भ्रम को आत्मसात कर चुका है कि वह बाहर भीतर का भेद मिटा चुका है। अपनी प्रतिक्रिया के लिए वह बाजार की ओर झांकता है जहाँ कोई बाजारू खबरिया चैनल उसकी प्रतिक्रिया को निर्देशित और नियंत्रित करता है जो मीडिया ब जाते खुद दुनिया के किसी कोने में बैठे किसी बड़े कॉर्पोरेट हॉउस से निर्देशित और नियंत्रित है। 


अब प्रतिक्रिया समाज के कोढ़ बाबाओं की बड़ी गाड़ियों विलासितापूर्ण रहन सहन भव्य महलों और महलों सी ही सजीधजी रूपवान चेलियों के लावण्य और उनके बाबाओं से अंतरंग फंतासी प्रधान संबंधों पर होती है। प्रतिक्रिया मनोरंजन बन चुकी है, अभिव्यक्ति भी। हम संवेदनाओं और ऐहसास के लिये बाजार पर निर्भर हैं चिंताओं और चिंतन के लिये भी। कॉर्पोरेट को मुनाफ़ा देने वाले प्रमुख विषय, प्रमुख चिंताओं का विषय बन गए हैं जिनके सच और झूठ दोनों के बीच पैसों का बड़ा ढेर है जो न झूठ को छिपने देता है न सच को बाहर आने देता है इन्हीं सबके बीच हम पढ़ते सुनते हैं ग्लोबल वार्मिंग और आइस ऐज, इन्हीं के बीच हमारी चिंताएं बाघों की संख्या और उनके बचाव संवर्धन पर जा टिकती है फिर हमें बताया जाता है पर्यावरण और हम मनोरंजन की तरह चिंता करते हैं।

बदलाव के दौर में बाजार नियंत्रित चिंता और चिंतन मनोरंजन बन गया है जिसे ड्रॉइंगरूम या बेडरूम में हम अपनी ग्राह्यता के हिसाब से पचा रहे हैं। यानि अब हम महज एक कूड़ादान होकर रह गए हैं जिसमें बाजार हमारी ग्राह्य शक्ति के अनुसार अपनी इच्छा की वस्तुएं, विचार, क्रिया, प्रितिक्रिया, संवेदनशीलता, भाव और अभिव्यक्ति भी डालता जाता है। आपको गलतफ़हमी हो सकती है कि मैं बाजारवाद का विरोध कर रहा हूँ किंतु यह सच नहीं है। दरअसल तो मैं व्यक्तियों में से खो चुके व्यक्तित्व और आदमी के अंदर लुप्त हो गए आदमी पर हैरान हूँ। जहां समाज एकरस है, ऐहसास अभिव्यक्ति एकरस हैं सबकुछ "कंट्रोल्ड बाई अदर्स है"  व्यक्ति के नपे तुले ऐहसास नपी तुली संवेदनाएं नपी तुली खुशियाँ और नपे तुले ग़म बाहर आ रहे हैं। इस सबके बीच सबसे अधिक अभिव्यक्ति की एकरसता सालती है। सभी एक सा ही कैसे महसूस कर सकते हैं एक सा ही कैसे लिख सकते हैं लेकिन एक सा ही महसूस किया जा रहा है लिखा भी जा रहा है। एक ही जैसा से मेरा अर्थ यहाँ कॉपी पेस्ट से नहीं है बल्कि उन सीमाओं से है जिनमें अभिव्यक्ति बंध गयी है। 


इसी माह के प्रथम सप्ताह अपने वरिष्ठ कवि मित्र से बंधी हुई अभिव्यक्तियों के खालीपन पर चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था लोग कुंठित हैं निराश हैं। मेरा प्रतिवाद था कि यदि कुंठित या निराश होते अवश्य कुछ मौलिक कुछ नया लिखते। दरअसल तो न इन्हें कोई पीड़ा है न निराशा न कुंठा ही है क्योंकि यदि ऐसा होता तो ये मौलिक आंदोलित करने वाला दिल दिमाग़ के किसी कोने में कुछ ठहरता सा लिखते। वो कहना चाहते थे वास्तविकता की कुंठाओं ने छोटे शहरों में लेखन को जकड़ लिया है। मेरा आक्रोश लेखन में अभिव्यक्ति को मनोरंजन बना लेने से था जबकि छोटे शहरों में विलुप्त होती जा रही लेखन की ईमानदारी पर हम दोनों सहमत थे। आज मौलिक ईमानदार लेखन बड़े शहरों तक सीमित होकर रह गया है चाहे वे स्टेट मेट्रो सिटीज़ हों या नेशनल मेट्रो सिटीज़ हों, सुविधाओं और उपलब्धताओं के चलते सभी लेखन जिसे लेखन कहा जा सके मैट्रोज़ की संपदा बन चुका है। एक तो इसलिए कि वहाँ बड़े छापेखानों के चलते तमाम बड़े लेखक कवि पत्रकार आजादी के बाद से ही नए रास्ते खोल चुके थे स्थापित हो चुके थे दूसरे इन बड़े लेखकों के बाद संपादकों और प्रकाशकों ने अन्य लेखक बना दिए जो आज मौलिक ईमानदार लेखक न सही नामचीन स्थापित लेखक तो हैं। 


स्थापित लेखक जब जीवकोपार्जन के लिये मेट्रो सिटीज़ में आये तो अपने चिंतन में ग्रामीण जीवन और संस्कृति भी ले आये जिसे उन्होंने कागज़ों पर उकेरा क्योंकि यह सबकुछ वही था जो उन्होंने जिया था अनुभव किया था, उनका चिंतन और लेखन व्यक्ति की समस्याओं के प्रति ईमानदार रहा, समाज को झकझोरता रहा। लेखन की यह ईमानदारी तब भी रही जब उन्होंने मेट्रो सिटी के अर्बनाइज़्ड जीवन और उसमें अपने घुलमिल जाने के बीच आयी समस्याओं और जीवन की वसिंगतियों विद्रूपताओं को दर्पण दिखाया। छोटे शहरों में सब्जेक्ट की इन  सुविधाओं का अभाव  झलकता है, ईमानदारी का भी। क्योंकि इन शहरों में ग्रामीण और शहरी जीवन घुलमिल गए हैं जहां मेट्रो सिटीज़ जैसी चंद सुविधाओं और बहुत सी अलामतों के बीच जीवन गड्ड मड्ड हो चला है। इन सबके बीच लेखक या कवि सब्जेक्ट के आभाव से जूझ रहा है, यह अभाव तब और मुखर हो जाता है जब इन शहरों का लेखक गांवों से जुड़ा नहीं होता। नतीजतन वह लेखन की अपेक्षा कविताओं को तरजीह देने लगता है। त्रासदी यह है कि कविताओं में संदेश एवं अभिव्यक्ति की ईमनदारी का न उसे ऐहसास है न उसके प्रति कोई रूचि। 

कवियों ने अपनी रूचि और सुविधानुसार बनावटी शैली पकड़ ली है जिसमें सब्जेक्ट नहीं होता अभिव्यक्ति भी नहीं, बस दीख पड़ता है तो सुंदर आडंबरपूर्ण शब्दों का सुगठित विन्यास जो न समाज के किसी पक्ष से जुड़ा है न व्यक्तिगत अनुभवों, एहसासों, प्रतिक्रियाओं को ही अभिव्यक्त करता है जिसके चलते कविता बाँझ हो गयी है। वोकैबुलरी सीमित है और अभिव्यक्ति स्वयं के लिए भी ढाई घंटे की फिल्म सा मनोरंजन है। सोशल मीडिया ऐसे कवियों से भरा पड़ा है कुछ तो एक दिन में दस बीस तक कविताएं लिख रहे हैं जबकि उन्होंने पूरे जीवन दस कवि भी नहीं पढ़े होंगे। इन सबके बीच अपवाद स्वरूप जो लेखक कवि निकल रहे हैं वो राष्ट्रिय स्तर पर भी नजर आते ही हैं। दूसरी ओर लेखकों की गिरती संख्या ने पत्र पत्रिकाओं को भी प्रभावित किया है।

प्रेम और प्रणय भी सामाजिक मानदंडों के अनुरूप परिपक्व हो गए हैं। अब ब्रेकअप होने पर व्यक्ति द्वारा पहले सी रुमानियत वाला हो हल्ला नहीं होता प्रेम में होने वाली आत्महत्याओं की जगह एकतरफा प्रेम में होने वाली हत्याओं या ऑनर किलिंग ने ले ली है लिव इन रिलेशनशिप प्रेम विवाह का विकल्प बनकर उभरी है। संवेदनाएं वक़्ती हैं और बेहिस भी। अस्पतालों में मरीजों के उकताए हुए तीमारदार दूसरे मरीजों को देखकर कुछ क्षण मनोरंजन रूपी संवेदनाएं व्यक्त करते हैं फिर मोबाइल फोन में सोशल मीडिया पर व्यस्त हो जाते हैं। इंटरनेट क्रांति और मोबाइल क्रांति के कारण दुनिया के छोटे होने ने लोगों को छोटा बहुत छोटा कर दिया है। संक्रमण काल में समाज और व्यक्ति के बाहर भीतर का अंतर सच में बौना हो चला है।  ऐसे में किस जगह किस बदलाव से कितनी सकारात्मकता की अपेक्षा की जाये इसे भविष्य पर छोड़ते हुए फ़िलहाल दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल के एक शेर से अंत करूंगा :

                                                  तुम्हारे पांवों के नीचे कोई जमीन नहीं 
                                                  कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं 


                                                                                                                 "फ़तेह"

Saturday, 13 January 2018

प्रेस कांफ्रेंस

                                               हास्य कविता 



मुझको भी नेता बनवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
गद्दी नंबर एक दिला दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 


चुप चुप रहते केजरीवाल मफलर हट गया खुले हैं बाल 
कुमार विश्वास लगावे जोर कपिल मिश्रा मचा रहा शोर 
गुप्ता को राजयसभा भिजवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
कपिल - कुमार को चुप करवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 


भगवा ने किया है बुरा हाल दीदी डर गयी हँसे बंगाल 
ये कैसा हो गया फजीता पंडितों में बंट रही है गीता 
भाजपा की रफ्तार घटा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
शुरू फिर से इफ्तार करा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 


अध्यक्ष हो गए राहुल भैया कांग्रेस की डूब रही  नैया 
मंदिर पूजा और जनेऊ फिर भी सत्ता हाथ न देहू 
मेरा कर्नाटक बचवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
बहरीन से संदेसा भिजवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 


योगी जी ने डंडा उठाया उत्तर प्रदेश पकड़ में आया 
बहनजी अखिलेश  मचावें शोर ईवीएम वोटों की चोर 
ईवीएम को बंद करा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
बैलेट पेपर फिर चलवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 


मोदीजी भी  हैं परेशान जीत गए पर मिला न मान 
जीएसटी की मार देख ली ले के बैठ गया अरुण जेटली 
जेटली से पीछा छुड़वा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
कर्नाटक सरकार दिला दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 


खाली बैठे हो रहे बोर ट्विटर पे मिलते साँझ और भोर 
हमको भी कोई काम दिला दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
कामचलाऊ पद दिलवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
मेरी प्रेस कांफ्रेंस करवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 

Wednesday, 10 January 2018

सच्ची बात सदुल्ला कहे सबके मन से उतरा रहे

                                               अच्छा है दिल के पास रहे पासबाने अक़्ल
                                               लेकिन कभी कभी इसे तनहा भी छोड़ दे

इस शेर ने इतना तो साबित कर दिया कि ग़ालिब हुजूर का पासबाने अक़्ल बड़ा जिम्मेदार और कर्तव्य परायण था जो हुजूर के अनुशासनहीन आवारा दिल को भी खेंच खांच कर ठिकाने बैठाने का प्रयास तो करता ही था। इसी से आजिज़ आ कर ग़ालिब साब अक़्ल के पासबान को हड़काने का प्रयास कर रहे थे। कह नहीं सकता ग़ालिब साहब इसमें सफल हुए या नहीं। इधर अपनी स्थिति उलट है। हमारी अक़्ल का पासबान कदरन आवारा और अनुशासनहीन है एक बार आवारगी को निकल गया तो मजाल है कहीं आसपास भी नजर आये। रह जाते हैं बेचारे हम और हमारा दिल। और फिर दोनों को, फ़िराक़ साहब की शैली में कहूं तो एक ही काम रह जाता है, मैं दिल को रो लूं हूँ और दिल मुझको रो लेवे है। इस रुदनबाजी से झुंझला कर दिल ही दूर-पास से ढूंढ ढांढ कर अक़्ल के पासबान को घेर-घोट कर पकड़ लाया हालाँकि अक़्ल की आदत जानने के कारण हम इसके पक्ष में नहीं थे।

                                           इस बार पासबाने अक़्ल ने आते ही सबसे पहले हमें घूरा फिर दिल को और एक तुरत प्रश्न जड़ दिया : "ये एक साल 2017 पूरा का पूरा छोड़ा था तुम्हारे पास तुम दोनों ने क्या किया इसका ?" इस तरह की जवाबदेही हमें पसंद तो नहीं लेकिन औचक हमले से हम डिफेंसिव हो गये। "क्या करना था इसका", मैंने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा। "कुछ भी करते" पासबाने अक़्ल अकड़ने लगा "क्या अचीवमेंट है बताओ ?"  क्योंकि अब तक हमने खुद को व्यवस्थित कर लिया था इसलिए पलट अकड़ में कहा : देख भाई इस साल का अचीवमेंट बस इतना है कि इस साल भी जीवित हूँ और तुम्हारा काम है दिल के पास रहने का तो वही करो। पासबाने अक़्ल थोड़ा गत में आया ढीला हुआ और कहने लगा वो जो पिछले साल की राजनितिक लफ्फाजी चल रही थी उसका क्या हुआ। मैं भी खाली था बोला हे अक़्लरूपी धृतराष्ट्र अब मैं तुम्हें संजय की तरह नव वर्ष 2018 के आगमन का वृतांत सुनाता हूँ।

                                           जब 2017 शुरू हुआ तब उत्तम प्रदेश में समाजवाद उथल पुथल हो रहा था।  टीपू भैया नेताजी और चाचाजी से चलाने के लिए मांगी साईकिल उठाकर ले गए थे और लौटाने के नाम पर कह दिया था कि साईकिल मेरी है नेताजी की तरफ से मैंने खुद साईकिल की वसीयत अपने नाम लिख ली है लिहाजा साईकिल पर मेरा अधिकार है। नेताजी अभी मामले को समझने का दिखावा कर रहे थे और चाचाजी उन्हें चुनाव आयोग में धकेले दे रहे थे नतीजतन नेताजी झुंझला गए और आयोग से कह आये जिसे देनी हो साईकिल उसे ही दे दो मुझे इसकी जरूरत नहीं। आयोग ने देखा टीपू भैया साईकिल लिए बैठें हैं और कागजों के नाम पर छोटा हाथी भरकर वसीयत आयोग में ठेले दे रहे हैं। अंततः चुनाव आयोग ने खुद राहत की साँस लेने के लिए साईकिल टीपू भैया को ही थमा दी।

                                        चाचाजी भावुक होकर कसमें वादे प्यार वफ़ा गाते रह गए। टीपू भैया ने अपनी ही तरह के पढ़े लिखे नए मित्र को साईकिल पर बैठाया और चुनाव सड़क पर ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे गाते निकल लिए। सड़क में गड्ढे ज्यादा थे और मित्र का वजन साईकिल संभाल नहीं पा रही थी सो दोस्ती तो टूटती न टूटती साईकिल टूट गयी। अब टीपू भैया साईकिल की रिपेयर करते बैठे हैं कहते हैं पाँच साल लगेंगे जबकि उनका मित्र देश विदेश घूम रहा है। उत्तम प्रदेश में योगीजी के भगवा के आगे समाजवाद की लाली उतर गयी। दरअसल तो लाली क्या भगवा के सामने पीला हरा नीला हर रंग उतर गया। बहनजी ने सारा गुस्सा evm पर उतारना शुरू कर दिया। बहनजी का कहना है कि evm में नीला रंग भरा ही नहीं गया। चुनाव आयोग ने कहा हमने मशीन में कोई रंग नहीं भरा मशीन सफेद है खुद आकर देख लो लेकिन ऐसी बातें कौन सुने जबकि राजनीती ब जाते खुद लफ्फाजी प्रधान महकमा है।

                                           साल 2018 की शुरुआत ही धमाकेदार रही। ये धमाके दिसंबर के प्रथम सप्ताह में ही शुरू हो गए थे जब अखिल भारतीय राजनितिक पार्टी के अंतर्राष्ट्रीय इलीट भड़भड़िये ने प्रधानमंत्री को हिंदुस्तानी में गाली बकना शुरू कर दिया। मामला गुजरात चुनाव का था इसलिए भयभीत पार्टी ने तुरंत कार्यवाही दिखाने को अपने इलीट लीडर को निलंबित कर भी दिया लेकिन तीर कमान से निकल चुका था। खैर गुजरात चुनाव जीतना कांग्रेस के लिए संभव न था सो हार गयी। लेकिन चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस जातियों के जिस रथ पर चढ़ी वह या तो अंततः कांग्रेस को लेकर डूबेगा या देश को। फ़ैसला जनता को करना है कि अगले दो वर्षों में वह किसे डुबाना चाहेगी।

                                          आरक्षण रथ पर सवार होकर पटेलों का नेता बनने वाले फर्जी केजरीवाल का अपने क्षेत्र में लगभग वही हाल हुआ है जो गुजरात चुनाव में असली केजरीवाल का हुआ है। दरअसल नए नेतृत्व की छाँव में कांग्रेस की राजनीती उत्तर प्रदेश की बहनजी वाली होने लगी है। दलित मुस्लिम गठजोड़ के साथ अन्य जातियों का गठजोड़ बनाने का नया फ़ैसला अतिउत्साह और जल्दबाजी में लिया गया। बहुजन समाज पार्टी की तरह दलित मुस्लिम आधार को अपने पक्ष में स्थायतित्व देने का प्रयास  इसके मूल में है। कांग्रेस की ओर से घटता भाजपा की ओर खिसकता दलित वोट बैंक पार्टी के लिए गहन चिंता का विषय बन गया और इसी की भरपाई के लिए जल्दबाजी में जो फ़ैसला लिया गया है वह पार्टी के लिए भविष्य में जहर की खेती साबित हो सकता  हैं। जहाँ कांग्रेस को बाबू जगजीवन राम, बूटा सिंह या कांशीराम जैसे नेताओं की जरूरत थी वहाँ युवा अध्यक्ष दलितों का जाकिर नाइक पकड़ लाये हैं। यह निश्चित ही विस्फ़ोटक होगा। हिन्दू नाराज न हों इस वजह से आजकल मुसलमानों को साधने का काम विदेश जाकर किया जा रहा है। 1987 के बाद कांग्रेस फिर से दो नावों में पांव फँसा रही है यह बैक फायर भी कर सकता है।
                                         
                                             गुजरात हार के बाद कांग्रेस के पास जश्न मनाने का कोई कारण नहीं था लेकिन जश्न मनाया गया। जश्न मनाने के लिए रिप्रेज़ेंटेटिव फॉर्म ऑफ़ डेमोक्रेसी के मूल सिद्धांत, जो कि भारतीय संविधान में अंगीकृत है, का मजाक उड़ाया गया। कांग्रेसी प्रवक्ता कहने लगे भारत में बीजेपी 31 प्रतिशत वोट लेकर 69 प्रतिशत लोगों पर भी राज कर रही है। पीपुल्स रिप्रेजेंटेशन के सिद्धांत के अलोक में यह तर्क समझ से परे है। कांग्रेस कब 51 प्रतिशत वोट के साथ सत्ता में थी लोगों को याद नहीं जबकि इस बार गुजरात में भाजपा 50 प्रतिशत वोटों के साथ ही सरकार में आयी है। संभतः यह जश्न परम पराजित युवराज के यज्ञोपवीत संस्कार के उपरांत महाराज बनने पर था। महाराज के यज्ञोपवीत की फोटो हमने भी देखी, बंदगला कोट के ऊपर पहने थे। गुजरात हार को कांग्रेस मॉरल विक्ट्री कह कर खुश हो भी सकती है।

                                                  कांग्रेस की मॉरल विक्ट्री न भी हो लेकिन भाजपा की गुजरात विजय भी उत्साह वर्धक नहीं है। ईमानदारी से कहा जाये तो यह दिल तोड़ने वाली जीत है। हुजूरे आजम के राज्य में हुजूर का जलवा जितवा तो लाया लेकिन इसके बाद  सरकार की आर्थिक नीतियों पर जनता की नाराजगी की पोल खुल ही गयी है। दरअसल मनवांछित फॉरेन इन्वेस्टमेंट और मेक इन इंडिया न होने की वजह से लगता है हुजूरे आजम के खजाना वजीर अपने अहलकारों के साथ यह समझाने में सफल रहे कि अगर विदेश से उतना पैसा नहीं आ रहा तो क्यों न जनता की जेब से ही खींच लिया जाये वोट तो हुजूर के नाम पर आ ही रहा है। जनता की जेब में रखे पैसोँ पर हर संभव प्रहार हुआ। यह गलत है सताने वाला है तोड़ने वाला है चिढ़ाने वाला है। आज हालत यह है कि आम आदमी डरता है कहीं इस जेब से उस जेब में पैसे रखने पर टैक्स न लग जाये। आने वाले  भाजपा शासित राज्यों में जो चुनाव होने हैं उनमें भाजपा को नाकों चने चबाने पड़ सकते हैं। और ऐसा आम आदमी पर पड़े आर्थिक प्रहारों के चलते होगा। इसके अतिरिक्त स्थानीय कारण भी होंगे। अब हर राज्य तो मोदीजी का गृह राज्य है नहीं।

                                                     लेख लंबा हो रहा है लेकिन यहाँ अगर मैं आम आदमी पार्टी की बात नहीं करूंगा तो यह अधूरा ही रहेगा। पिछले हफ्ते कविवर कुमार विश्वास को देखा एक हारा हुआ टूटा राजनीतिज्ञ नजर आया हलांकि कवि वैसा ही था जैसा आंदोलन के दिनों में दीखता था। आखिर केजरीवाल ने एक और बलि ले ही ली। केजरीवाल और कुमार विश्वास के राजनितिक चरित्र में मूल अंतर है। अराजक क्रूसेडर एक पूर्णतः फोकस्ड राजनीतिज्ञ हैं वो राजनीती के लिए सिद्धांत छोड़ेंगे अपने ही बनाये नियम तोड़ेंगे बच्चों की झूठी कसमें खाएंगे  यार मारी करेंगे हर तरह का नाटक करेंगे लेकिन सत्ता का उदेश्य नहीं छोड़ेंगे। पैसे से सत्ता और सत्ता से पैसा वाले केजरीवाली जुमले में आज वह खुद उलझे हुए हैं, भ्रष्टाचार निकम्मेपन ओवर एम्बिशस होने के सभी आरोपों को क्रूसेडर महोदय जिस आसानी और बेशर्मी से सह जाते हैं यह सब कविवर के बसका नहीं है।

                                                        कविवर फाइटर नहीं है अनुशासित और फोकस्ड भी नहीं है यह लेखक कवियों शायरों का मूल दोष या गुण होता है। लेकिन कुमार विश्वास एक हद से आगे सिद्धांत नहीं तोड़ पाते एक हद के बाहर कैमरे पर पकड़ा जाने वाला झूठ भी नहीं बोल पाते। कविवर का केजरीवाल से लड़कर जीतना मुश्किल लगता है। हालाँकि दसों दिशाएं सात खंड हारने के बाद अब केजरीवाल के पास जीतने को कुछ नहीं है आगे है तो सिर्फ हार। इस सबके बावजूद कुमार विश्वास क्योंकि जीतने के लिए लड़ने वाला योद्धा नहीं हैं, सो केजरीवाल से जीतना मुश्किल लगता है। उनका पसंदीदा योद्धा अभिमन्यु है अर्जुन नहीं। यानि जीत हार से अलग शहीद होने भर की तमन्ना है। यद्यपि अवसरों से खाली नहीं हैं चाहें तो भाजपा में कभी भी जाकर नेता बन सकते हैं लेकिन उसमें सिर्फ एक नेता जितना ग्लैमर रह जायेगा जबकि विश्वास अगर चाहे तो केजरीवाल को हराने वाला मुख्यमंत्री पद का दावेदार हो सकते हैं। लेकिन कविवर इतना जिम्मेदारी भरा संघर्ष का बोझ उठाने को तैयार होंगे मुझे नहीं लगता।

                                                  कभी गिरते तो कभी गिर के संभलते रहते
                                                  बैठे रहने से तो बेहतर था के चलते रहते
                                                                                                                 (नईम अख्तर)



वादा  है कि कम से कम इस माह बहुत जल्दी जल्दी मिलूंगा।