Monday, 15 January 2018

मन की बात

मन की बात

                 


                           तुम्हारे पांवों के नीचे कोई जमीन नहीं 


ठहरते चलते  समय के साथ जाने कितना ठहरते जाने कितना चलते हम इतने सामाजिक तो हो गये हैं कि व्यक्ति को उसकी पीड़ा और निराशाओं के बीच घुटता हुआ छोड़ दिया है, मौन और अकेला। वही व्यक्ति जो जन्म से ही हमारे भीतर था जो हमारे साथ बड़ा हुआ जो स्वप्नदृष्टा था, रूमानी था जीवित भी था, तब तक जब तक कि हम दुनियादार नहीं हो गए। अब वही व्यक्ति भीतर ही भीतर तड़पता है चीखता है चुनौती देता है लेकिन हम मौन हैं, खुश हैं क्योंकि हम प्रतिक्रिया नहीं करते हमारी अभिव्यक्ति रुंध गयी है। दरअसल दुनियादार आदमी अभिव्यक्ति, रुमानियत और व्यक्तित्व के अंत का कब्रिस्तान है जहाँ सारी कब्रें सीमेंटेड हैं सभी एकरंग पुती हुई जिसके अभिशाप में व्यक्ति की अभिव्यक्ति और प्रतिक्रियाएं एकरस हैं। 


लोग अपने कष्टों कुंठाओं और निराशाओं को व्यक्त नहीं करते अभावों को भी नहीं भावों को भी नहीं। स्थिर सुख के नपे तुले भावों के साथ हर चेहरा नयी सभ्यता का अनजान वाहक बना नजर आता है जिसके पास पाने के लिए पूरा बाजारवाद है और खोने के लिए एक व्यक्ति ही था जिसे वह पहले ही दफ़ना आया है बिना इस बात की परवाह किये कि वह जीवित था या मृत। वह इस बात से भी चिंतित नहीं है कि कहीं भविष्य में उसके भीतर दफ़्न यही आदमी कभी बाहर निकल आया तो कैसे हैंडल करेंगे ? क्या फिर एक हत्या होगी ? दुनियादार आदमी इस भ्रम को आत्मसात कर चुका है कि वह बाहर भीतर का भेद मिटा चुका है। अपनी प्रतिक्रिया के लिए वह बाजार की ओर झांकता है जहाँ कोई बाजारू खबरिया चैनल उसकी प्रतिक्रिया को निर्देशित और नियंत्रित करता है जो मीडिया ब जाते खुद दुनिया के किसी कोने में बैठे किसी बड़े कॉर्पोरेट हॉउस से निर्देशित और नियंत्रित है। 


अब प्रतिक्रिया समाज के कोढ़ बाबाओं की बड़ी गाड़ियों विलासितापूर्ण रहन सहन भव्य महलों और महलों सी ही सजीधजी रूपवान चेलियों के लावण्य और उनके बाबाओं से अंतरंग फंतासी प्रधान संबंधों पर होती है। प्रतिक्रिया मनोरंजन बन चुकी है, अभिव्यक्ति भी। हम संवेदनाओं और ऐहसास के लिये बाजार पर निर्भर हैं चिंताओं और चिंतन के लिये भी। कॉर्पोरेट को मुनाफ़ा देने वाले प्रमुख विषय, प्रमुख चिंताओं का विषय बन गए हैं जिनके सच और झूठ दोनों के बीच पैसों का बड़ा ढेर है जो न झूठ को छिपने देता है न सच को बाहर आने देता है इन्हीं सबके बीच हम पढ़ते सुनते हैं ग्लोबल वार्मिंग और आइस ऐज, इन्हीं के बीच हमारी चिंताएं बाघों की संख्या और उनके बचाव संवर्धन पर जा टिकती है फिर हमें बताया जाता है पर्यावरण और हम मनोरंजन की तरह चिंता करते हैं।

बदलाव के दौर में बाजार नियंत्रित चिंता और चिंतन मनोरंजन बन गया है जिसे ड्रॉइंगरूम या बेडरूम में हम अपनी ग्राह्यता के हिसाब से पचा रहे हैं। यानि अब हम महज एक कूड़ादान होकर रह गए हैं जिसमें बाजार हमारी ग्राह्य शक्ति के अनुसार अपनी इच्छा की वस्तुएं, विचार, क्रिया, प्रितिक्रिया, संवेदनशीलता, भाव और अभिव्यक्ति भी डालता जाता है। आपको गलतफ़हमी हो सकती है कि मैं बाजारवाद का विरोध कर रहा हूँ किंतु यह सच नहीं है। दरअसल तो मैं व्यक्तियों में से खो चुके व्यक्तित्व और आदमी के अंदर लुप्त हो गए आदमी पर हैरान हूँ। जहां समाज एकरस है, ऐहसास अभिव्यक्ति एकरस हैं सबकुछ "कंट्रोल्ड बाई अदर्स है"  व्यक्ति के नपे तुले ऐहसास नपी तुली संवेदनाएं नपी तुली खुशियाँ और नपे तुले ग़म बाहर आ रहे हैं। इस सबके बीच सबसे अधिक अभिव्यक्ति की एकरसता सालती है। सभी एक सा ही कैसे महसूस कर सकते हैं एक सा ही कैसे लिख सकते हैं लेकिन एक सा ही महसूस किया जा रहा है लिखा भी जा रहा है। एक ही जैसा से मेरा अर्थ यहाँ कॉपी पेस्ट से नहीं है बल्कि उन सीमाओं से है जिनमें अभिव्यक्ति बंध गयी है। 


इसी माह के प्रथम सप्ताह अपने वरिष्ठ कवि मित्र से बंधी हुई अभिव्यक्तियों के खालीपन पर चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था लोग कुंठित हैं निराश हैं। मेरा प्रतिवाद था कि यदि कुंठित या निराश होते अवश्य कुछ मौलिक कुछ नया लिखते। दरअसल तो न इन्हें कोई पीड़ा है न निराशा न कुंठा ही है क्योंकि यदि ऐसा होता तो ये मौलिक आंदोलित करने वाला दिल दिमाग़ के किसी कोने में कुछ ठहरता सा लिखते। वो कहना चाहते थे वास्तविकता की कुंठाओं ने छोटे शहरों में लेखन को जकड़ लिया है। मेरा आक्रोश लेखन में अभिव्यक्ति को मनोरंजन बना लेने से था जबकि छोटे शहरों में विलुप्त होती जा रही लेखन की ईमानदारी पर हम दोनों सहमत थे। आज मौलिक ईमानदार लेखन बड़े शहरों तक सीमित होकर रह गया है चाहे वे स्टेट मेट्रो सिटीज़ हों या नेशनल मेट्रो सिटीज़ हों, सुविधाओं और उपलब्धताओं के चलते सभी लेखन जिसे लेखन कहा जा सके मैट्रोज़ की संपदा बन चुका है। एक तो इसलिए कि वहाँ बड़े छापेखानों के चलते तमाम बड़े लेखक कवि पत्रकार आजादी के बाद से ही नए रास्ते खोल चुके थे स्थापित हो चुके थे दूसरे इन बड़े लेखकों के बाद संपादकों और प्रकाशकों ने अन्य लेखक बना दिए जो आज मौलिक ईमानदार लेखक न सही नामचीन स्थापित लेखक तो हैं। 


स्थापित लेखक जब जीवकोपार्जन के लिये मेट्रो सिटीज़ में आये तो अपने चिंतन में ग्रामीण जीवन और संस्कृति भी ले आये जिसे उन्होंने कागज़ों पर उकेरा क्योंकि यह सबकुछ वही था जो उन्होंने जिया था अनुभव किया था, उनका चिंतन और लेखन व्यक्ति की समस्याओं के प्रति ईमानदार रहा, समाज को झकझोरता रहा। लेखन की यह ईमानदारी तब भी रही जब उन्होंने मेट्रो सिटी के अर्बनाइज़्ड जीवन और उसमें अपने घुलमिल जाने के बीच आयी समस्याओं और जीवन की वसिंगतियों विद्रूपताओं को दर्पण दिखाया। छोटे शहरों में सब्जेक्ट की इन  सुविधाओं का अभाव  झलकता है, ईमानदारी का भी। क्योंकि इन शहरों में ग्रामीण और शहरी जीवन घुलमिल गए हैं जहां मेट्रो सिटीज़ जैसी चंद सुविधाओं और बहुत सी अलामतों के बीच जीवन गड्ड मड्ड हो चला है। इन सबके बीच लेखक या कवि सब्जेक्ट के आभाव से जूझ रहा है, यह अभाव तब और मुखर हो जाता है जब इन शहरों का लेखक गांवों से जुड़ा नहीं होता। नतीजतन वह लेखन की अपेक्षा कविताओं को तरजीह देने लगता है। त्रासदी यह है कि कविताओं में संदेश एवं अभिव्यक्ति की ईमनदारी का न उसे ऐहसास है न उसके प्रति कोई रूचि। 

कवियों ने अपनी रूचि और सुविधानुसार बनावटी शैली पकड़ ली है जिसमें सब्जेक्ट नहीं होता अभिव्यक्ति भी नहीं, बस दीख पड़ता है तो सुंदर आडंबरपूर्ण शब्दों का सुगठित विन्यास जो न समाज के किसी पक्ष से जुड़ा है न व्यक्तिगत अनुभवों, एहसासों, प्रतिक्रियाओं को ही अभिव्यक्त करता है जिसके चलते कविता बाँझ हो गयी है। वोकैबुलरी सीमित है और अभिव्यक्ति स्वयं के लिए भी ढाई घंटे की फिल्म सा मनोरंजन है। सोशल मीडिया ऐसे कवियों से भरा पड़ा है कुछ तो एक दिन में दस बीस तक कविताएं लिख रहे हैं जबकि उन्होंने पूरे जीवन दस कवि भी नहीं पढ़े होंगे। इन सबके बीच अपवाद स्वरूप जो लेखक कवि निकल रहे हैं वो राष्ट्रिय स्तर पर भी नजर आते ही हैं। दूसरी ओर लेखकों की गिरती संख्या ने पत्र पत्रिकाओं को भी प्रभावित किया है।

प्रेम और प्रणय भी सामाजिक मानदंडों के अनुरूप परिपक्व हो गए हैं। अब ब्रेकअप होने पर व्यक्ति द्वारा पहले सी रुमानियत वाला हो हल्ला नहीं होता प्रेम में होने वाली आत्महत्याओं की जगह एकतरफा प्रेम में होने वाली हत्याओं या ऑनर किलिंग ने ले ली है लिव इन रिलेशनशिप प्रेम विवाह का विकल्प बनकर उभरी है। संवेदनाएं वक़्ती हैं और बेहिस भी। अस्पतालों में मरीजों के उकताए हुए तीमारदार दूसरे मरीजों को देखकर कुछ क्षण मनोरंजन रूपी संवेदनाएं व्यक्त करते हैं फिर मोबाइल फोन में सोशल मीडिया पर व्यस्त हो जाते हैं। इंटरनेट क्रांति और मोबाइल क्रांति के कारण दुनिया के छोटे होने ने लोगों को छोटा बहुत छोटा कर दिया है। संक्रमण काल में समाज और व्यक्ति के बाहर भीतर का अंतर सच में बौना हो चला है।  ऐसे में किस जगह किस बदलाव से कितनी सकारात्मकता की अपेक्षा की जाये इसे भविष्य पर छोड़ते हुए फ़िलहाल दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल के एक शेर से अंत करूंगा :

                                                  तुम्हारे पांवों के नीचे कोई जमीन नहीं 
                                                  कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं 


                                                                                                                 "फ़तेह"

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