वर्तमान राजनितिक घटनाक्रम से गुजरते पिछले दिनों से स्पष्ट दीखने लगा था कि आने वाले समय में मोदी सरकार के विरुद्ध देश भर में एक विशेष प्रकार के असंतोष का माहौल बनने जा रहा है जो प्रकृति में लगभग वही होगा जो 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन के समय कांग्रेस के नेतृत्व वाली 'यूपीए' सरकार के विरुद्ध बन गया था। इस तथ्य से समस्त मीडिया कितना अवगत था कह नहीं सकते लेकिन सोशल मीडिया पर प्रभंजन के रव को सहज महसूस किया जा सकता था किंतु सोशल मीडिया बहादुर भाजपा, अति आत्ममविश्वास की अफ़ीम के उनींदेपन में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के विरुद्ध पनप रहे असंतोष को पहचानने में असफल रही। परिणाम आज सामने आने लगा है।
सवर्णों का भारत बंद वर्तमान में भले SC/ST एक्ट के विरुद्ध एक सहज प्रतिक्रिया सा दीख पड़ता है लेकिन इसे यहीं तक समझना एक बड़ी भूल होगी। SC/ST एक्ट तो सुप्रीम कोर्ट का संशोधन करने वाला फैसला आने से पहले भी यही था फिर सवर्ण या ओबीसी वर्ग लगभग तीन दशकों से क्यों चुप बैठे थे क्यों इसके विरुद्ध कोई आंदोलन नहीं हो रहा था ? यह सच है कि SC/ST एक्ट का दुरूपयोग बहुत जबरदस्त तरीके से होता रहा था और इसके उपयोग को ही बंद करने की बात कह कर एक बार मुलायम सिंह उत्तरप्रदेश की सत्ता में आये थे और दूसरी बार बसपा सुप्रीमो मायावती ने मुख्यमंत्री बनने के बाद इसके दुरूपयोग को रोकने के लिए लिखित आदेश दिए थे लेकिन यह भी भी सच है कि इसका विरोध भारतीय राजनीती का मुख्य मुद्दा कभी नहीं बना।
दरअसल आज का जो सवर्ण विरोध दीख रहा है वह मूलतः सवर्णों का दलित एक्ट विरोध न होकर वह जनअसंतोष है जो मोदी सरकार के विरोध में पिछले समय आम जनता या जिसे हम मध्यम वर्ग के नाम से जानते हैं, में पनप रहा है। और यह विरोध उसी वर्ग का असंतोष है जिसने बड़े उत्साह और अरमानों से नरेंद्र मोदी को भारत के प्रधानमंत्री के रूप में सत्तारूढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसमें सवर्ण हैं पिछड़ा वर्ग है राष्ट्रवादी हैं हिंदुत्ववादी हैं। आज यही वर्ग भाजपा सरकार द्वारा खुद को ठगा गया महसूस कर रहा है।
भाजपा को प्रचंड बहुमत देकर सरकार में लाने वाले इस वर्ग ने जिन मुद्दों पर वोट दिया था वह मुद्दे थे ; राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, पेट्रोल डीज़ल की बढ़ती कीमतें, महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीती से मुक्ति, कश्मीर समस्या का समाधान, धारा 370 का खात्मा, रोज भारतीय सैनिकों की लाशें भेज रहे पाकिस्तान का स्थायी इलाज, कॉमन सिविल कोड, राम मंदिर का निर्माण। ये सब वही मुद्दे हैं जो हमेशा भाजपा के भी मुद्दे रहे हैं। इन्हीं मुद्दों पर विजय पाने के लिए जनता ने अभूतपूर्व उत्साह से 30 साल बाद पूर्ण बहुमत की समर्थ सरकार को गद्दीनशीन किया था। सरकार के प्रारम्भिक डेढ़ दो वर्ष में इनमें से कुछ मुद्दों पर कुछ काम होता लगा भी किंतु अंततः वह सब कहीं पहुँचता नहीं दिखा बल्कि जनता इन मुद्दों पर सरकार की न समझ आने वाली नीतियों पर असमंजस में नजर आने लगी।
हुआ यह कि राष्ट्रवाद ट्विटर, फेसबुक की मीडिया सेल और अंधभक्तों का मसला बनकर रह गया जिन्होंने उसे गालियों का राष्ट्रवाद बना दिया, कच्चे तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक तिहाई रह जाने के बावजूद आम जनता को एक पैसे की राहत न दी गयी, भ्रष्टाचार सरकार के स्तर पर खत्म हुआ लेकिन सरकारी अधिकारी कर्मचारियों के स्तर पर कोई फर्क नहीं पड़ा, आतंकवाद उरी से पठानकोट तक सैन्य लाइन्स में जा घुसा जहाँ सैनिकों की शहादतें होती रहीं, कश्मीर में तो आतंकवाद की हमदर्द मुफ़्ती महबूबा के साथ भाजपा उस सत्ता का सुख लेने में लग गयी जो देश को खोखला कर रही थी आतंक के साये में रोज सैनिकों/सुरक्षा बलों की लाशें उठा रही थी और जनता के रोष, आक्रोश के बावजूद तीन साल इस सत्ता सुख पर काबिज रही। धारा 370 तो खैर क्या हटाते उलटे इनकी मुख्यमंत्री 35 A जैसे असंवैधानिक आर्टिकिल पर भारतीय राष्ट्र को धमकाती रही कि कश्मीर में तिरंगे को कंधा देने वाला नहीं मिलेगा।
उधर पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक का अगर कोई असर पड़ सकता था तो उसे केजरीवाल और कांग्रेस के नेताओं ने 'फर्जीकल स्ट्राइक' कह कर, सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठा कर न्यूट्रेलाईज़ कर दिया और पाकिस्तान को मौका दे दिया कि वह पहले की तरह अपने नापाक मंसूबों को परवान चढ़ाता रहे।
मुस्लिम तुष्टिकरण से मुक्ति दिलाने आये साहब लोग कुछ समय तो चुप रहे और इस चुप्पी का ही असर था कि खुद मुसलमान उलेमा आतंकवादियों के विरुद्ध फतवे देते नजर आये, लेकिन उसके बाद हुआ यह कि खुद प्रधानमंत्री मुहम्मद साहब की अर्चना और कुरान की बातों में लग गए इतना ही नहीं बल्कि संघ, जिससे कभी तुष्टिकरण की राजनीती पर सहानुभूति दिखाने की अपेक्षा कर ही नहीं सकते थे वह भी सरयू के किनारे नमाज पढ़ाने की योजना बनाने लगा। वह तो संत समाज का तीखा विरोध था जो 'संघ नमाज योजना' परवान न चढ़ सकी। इस नव तुष्टिकरण का सबसे घातक परिणाम यह हुआ कि अतिवादी मुसलमान मुफ़्ती मौलाना भारत के और टुकड़े करने, एक और अलग मुस्लिम देश की मांग करने लगे। अधिक कष्ट की बात ये है कि ऐसा सिर्फ कश्मीर में नहीं आपके टीवी चैनलों की डेली डिबेट्स में भी होने लगा।
राम मंदिर बनाने की बात तो खैर भूल ही जाइये वह तो अदालत के निर्णय के नाम पर पड़ा रहेगा और अदालत तो लगता नहीं हमारे जीवनकाल में कोई फ़ैसला देगी। कॉमन सिविल कोड के बारे में तो लॉ कमीशन को ही लगने लगा है कि इसकी कोई जरूरत नहीं। हालाँकि भाजपा सरकार मुस्लिम महिलाओं को 'न्याय दिलाने' की टीवी डिबेट्स में अति उत्साहित लगती है। अब इन मुद्दों के साथ हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, देशभक्ति, राम मंदिर जैसे अन्य मुद्दों पर भाजपा को सत्ता में लाया साधारण वर्ग का आम आदमी सोच रहा है कि जिन कारणों से मैं इस सरकार को लाया उनका क्या हुआ ? आम देशवासी का सोचना है कि अभी तक साबित व्यर्थ की नोटबंदी और कष्टकारी जीएसटी को सहन कर मैंने जो देश भर में भगवा लहरा दिया था उस से मुझे क्या हासिल हुआ ?
अब आकर तो जनसाधारण को इस सरकार की उसको कुछ न देने की नीयत पर ही शक़ होने लगा है। उज्ज्वला योजना, 18000 गांवों की बिजली 6 करोड़ शौचालयों से, आम शहरी मध्यम वर्ग जो अधिकांशतः सवर्ण तथा सो काल्ड पिछड़े वर्गों से बनता है, उसको क्या हासिल हुआ ? यहाँ आकर भाजपा सरकार पूरी तरह विफ़ल हुई और बजाय इस वर्ग के असंतोष को दूर करने के प्रवक्ताओं के टीवी डिबेट्स के सहारे चुनाव जीतने के मंसूबे बांधे बैठी है। 2014 में समस्त जातियों को एकत्र कर हिंदुत्व के एक सूत्र में पिरोने वाली भाजपा जातियों की माइक्रो इंजीनियरिंग में इस कदर मुब्तिला हो गयी कि हिंदुओं को फिर से जातियों में बाँट दिया। यह भाजपा की भयानक भूल रही जो अतरिक्त चतुराई में की गयी लगती है।
हिंदुओं के एकीकरण से भारत का जो नक्शा भगवा होता चला जा रहा था उसको जातियों में बाँटकर और वर्गों में वंचना का भाव पैदा कर भाजपा सरकार ने ही भगवा किले की दीवार को दरका दिया है। चार सालों से दलित शोषित पीड़ित वंचित किसान सुनता मध्यम वर्ग असंतुष्ट है क्योंकि महसूस करने लगा है कि इस जुमलेबाजी में मैं कहाँ हूँ। यह वह असंतोष है जिसमें संसद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलने की कार्यवही ने चिंगारी दिखा कर विस्फोट करा दिया है। अब इस सरकार विरोधी सामाजिक उथलपुथल और आंदोलित मानस का लाभ लेने विपक्षी दल भी मैदान में उतर आये हैं जो भले अपने पक्ष में माहौल न बना पायें लेकिन भाजपा की भगवा किले की दीवार कमजोर कर ही देंगे। कुछ हिंदुत्ववादी तो कहने भी लगे हैं कि 2019 में यदि दो ढाई साल के लिए कमजोर सरकार आ भी गयी तो कोई मुस्लिम राष्ट्र तो घोषित कर नहीं देगी। ढाई वर्षों में फिर सरकार बदल देंगे लेकिन इनकी राजनीती ठीक करना जरूरी हो गया है।
अगले माह अन्ना हजारे आरक्षण विरोधी आंदोलन लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान में बैठने वाले हैं। भले अन्ना हजारे से सहानुभूति न हो लेकिन अपने सरोकारों के चलते सामान्य मध्यम वर्ग और पिछड़ा वर्ग भी उस आंदोलन में भाग लेगा इसी तरह मजदूरों का भी आंदोलन अगले माह है। कुछ अन्य दलों के छोटे बड़े अनेक राजनीतिक आंदोलन इसी का लाभ लेकर शुरू कर दिए जाने की अपेक्षा की जा सकती है। स्पष्ट नजर आ रहा है कि भाजपा आने वाले समय में उसी स्थिति से दो चार होने वाली है जो यूपीए सरकार ने अपने अंतिम वर्ष में देखी थी। लेकिन आम आदमी को कुछ न देने की नीयत के चलते भाजपा वर्तमान स्थिति से जीत पाने में असमर्थ नजर आती है क्योंकि इतना समय निकाल दिया गया है कि अब इनकी जीतने की योग्यता पर ही संदेह होने लगा है। नवंबर में आने वाले विधानसभा चुनावों में भगवा नक्शे के बीचों बीच कमजोरी के कारण बड़े छेद होने की आशंका नजर आती है।
सवर्णों का भारत बंद वर्तमान में भले SC/ST एक्ट के विरुद्ध एक सहज प्रतिक्रिया सा दीख पड़ता है लेकिन इसे यहीं तक समझना एक बड़ी भूल होगी। SC/ST एक्ट तो सुप्रीम कोर्ट का संशोधन करने वाला फैसला आने से पहले भी यही था फिर सवर्ण या ओबीसी वर्ग लगभग तीन दशकों से क्यों चुप बैठे थे क्यों इसके विरुद्ध कोई आंदोलन नहीं हो रहा था ? यह सच है कि SC/ST एक्ट का दुरूपयोग बहुत जबरदस्त तरीके से होता रहा था और इसके उपयोग को ही बंद करने की बात कह कर एक बार मुलायम सिंह उत्तरप्रदेश की सत्ता में आये थे और दूसरी बार बसपा सुप्रीमो मायावती ने मुख्यमंत्री बनने के बाद इसके दुरूपयोग को रोकने के लिए लिखित आदेश दिए थे लेकिन यह भी भी सच है कि इसका विरोध भारतीय राजनीती का मुख्य मुद्दा कभी नहीं बना।
दरअसल आज का जो सवर्ण विरोध दीख रहा है वह मूलतः सवर्णों का दलित एक्ट विरोध न होकर वह जनअसंतोष है जो मोदी सरकार के विरोध में पिछले समय आम जनता या जिसे हम मध्यम वर्ग के नाम से जानते हैं, में पनप रहा है। और यह विरोध उसी वर्ग का असंतोष है जिसने बड़े उत्साह और अरमानों से नरेंद्र मोदी को भारत के प्रधानमंत्री के रूप में सत्तारूढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसमें सवर्ण हैं पिछड़ा वर्ग है राष्ट्रवादी हैं हिंदुत्ववादी हैं। आज यही वर्ग भाजपा सरकार द्वारा खुद को ठगा गया महसूस कर रहा है।
भाजपा को प्रचंड बहुमत देकर सरकार में लाने वाले इस वर्ग ने जिन मुद्दों पर वोट दिया था वह मुद्दे थे ; राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, पेट्रोल डीज़ल की बढ़ती कीमतें, महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीती से मुक्ति, कश्मीर समस्या का समाधान, धारा 370 का खात्मा, रोज भारतीय सैनिकों की लाशें भेज रहे पाकिस्तान का स्थायी इलाज, कॉमन सिविल कोड, राम मंदिर का निर्माण। ये सब वही मुद्दे हैं जो हमेशा भाजपा के भी मुद्दे रहे हैं। इन्हीं मुद्दों पर विजय पाने के लिए जनता ने अभूतपूर्व उत्साह से 30 साल बाद पूर्ण बहुमत की समर्थ सरकार को गद्दीनशीन किया था। सरकार के प्रारम्भिक डेढ़ दो वर्ष में इनमें से कुछ मुद्दों पर कुछ काम होता लगा भी किंतु अंततः वह सब कहीं पहुँचता नहीं दिखा बल्कि जनता इन मुद्दों पर सरकार की न समझ आने वाली नीतियों पर असमंजस में नजर आने लगी।
हुआ यह कि राष्ट्रवाद ट्विटर, फेसबुक की मीडिया सेल और अंधभक्तों का मसला बनकर रह गया जिन्होंने उसे गालियों का राष्ट्रवाद बना दिया, कच्चे तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक तिहाई रह जाने के बावजूद आम जनता को एक पैसे की राहत न दी गयी, भ्रष्टाचार सरकार के स्तर पर खत्म हुआ लेकिन सरकारी अधिकारी कर्मचारियों के स्तर पर कोई फर्क नहीं पड़ा, आतंकवाद उरी से पठानकोट तक सैन्य लाइन्स में जा घुसा जहाँ सैनिकों की शहादतें होती रहीं, कश्मीर में तो आतंकवाद की हमदर्द मुफ़्ती महबूबा के साथ भाजपा उस सत्ता का सुख लेने में लग गयी जो देश को खोखला कर रही थी आतंक के साये में रोज सैनिकों/सुरक्षा बलों की लाशें उठा रही थी और जनता के रोष, आक्रोश के बावजूद तीन साल इस सत्ता सुख पर काबिज रही। धारा 370 तो खैर क्या हटाते उलटे इनकी मुख्यमंत्री 35 A जैसे असंवैधानिक आर्टिकिल पर भारतीय राष्ट्र को धमकाती रही कि कश्मीर में तिरंगे को कंधा देने वाला नहीं मिलेगा।
उधर पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक का अगर कोई असर पड़ सकता था तो उसे केजरीवाल और कांग्रेस के नेताओं ने 'फर्जीकल स्ट्राइक' कह कर, सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठा कर न्यूट्रेलाईज़ कर दिया और पाकिस्तान को मौका दे दिया कि वह पहले की तरह अपने नापाक मंसूबों को परवान चढ़ाता रहे।
मुस्लिम तुष्टिकरण से मुक्ति दिलाने आये साहब लोग कुछ समय तो चुप रहे और इस चुप्पी का ही असर था कि खुद मुसलमान उलेमा आतंकवादियों के विरुद्ध फतवे देते नजर आये, लेकिन उसके बाद हुआ यह कि खुद प्रधानमंत्री मुहम्मद साहब की अर्चना और कुरान की बातों में लग गए इतना ही नहीं बल्कि संघ, जिससे कभी तुष्टिकरण की राजनीती पर सहानुभूति दिखाने की अपेक्षा कर ही नहीं सकते थे वह भी सरयू के किनारे नमाज पढ़ाने की योजना बनाने लगा। वह तो संत समाज का तीखा विरोध था जो 'संघ नमाज योजना' परवान न चढ़ सकी। इस नव तुष्टिकरण का सबसे घातक परिणाम यह हुआ कि अतिवादी मुसलमान मुफ़्ती मौलाना भारत के और टुकड़े करने, एक और अलग मुस्लिम देश की मांग करने लगे। अधिक कष्ट की बात ये है कि ऐसा सिर्फ कश्मीर में नहीं आपके टीवी चैनलों की डेली डिबेट्स में भी होने लगा।
राम मंदिर बनाने की बात तो खैर भूल ही जाइये वह तो अदालत के निर्णय के नाम पर पड़ा रहेगा और अदालत तो लगता नहीं हमारे जीवनकाल में कोई फ़ैसला देगी। कॉमन सिविल कोड के बारे में तो लॉ कमीशन को ही लगने लगा है कि इसकी कोई जरूरत नहीं। हालाँकि भाजपा सरकार मुस्लिम महिलाओं को 'न्याय दिलाने' की टीवी डिबेट्स में अति उत्साहित लगती है। अब इन मुद्दों के साथ हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, देशभक्ति, राम मंदिर जैसे अन्य मुद्दों पर भाजपा को सत्ता में लाया साधारण वर्ग का आम आदमी सोच रहा है कि जिन कारणों से मैं इस सरकार को लाया उनका क्या हुआ ? आम देशवासी का सोचना है कि अभी तक साबित व्यर्थ की नोटबंदी और कष्टकारी जीएसटी को सहन कर मैंने जो देश भर में भगवा लहरा दिया था उस से मुझे क्या हासिल हुआ ?
अब आकर तो जनसाधारण को इस सरकार की उसको कुछ न देने की नीयत पर ही शक़ होने लगा है। उज्ज्वला योजना, 18000 गांवों की बिजली 6 करोड़ शौचालयों से, आम शहरी मध्यम वर्ग जो अधिकांशतः सवर्ण तथा सो काल्ड पिछड़े वर्गों से बनता है, उसको क्या हासिल हुआ ? यहाँ आकर भाजपा सरकार पूरी तरह विफ़ल हुई और बजाय इस वर्ग के असंतोष को दूर करने के प्रवक्ताओं के टीवी डिबेट्स के सहारे चुनाव जीतने के मंसूबे बांधे बैठी है। 2014 में समस्त जातियों को एकत्र कर हिंदुत्व के एक सूत्र में पिरोने वाली भाजपा जातियों की माइक्रो इंजीनियरिंग में इस कदर मुब्तिला हो गयी कि हिंदुओं को फिर से जातियों में बाँट दिया। यह भाजपा की भयानक भूल रही जो अतरिक्त चतुराई में की गयी लगती है।
हिंदुओं के एकीकरण से भारत का जो नक्शा भगवा होता चला जा रहा था उसको जातियों में बाँटकर और वर्गों में वंचना का भाव पैदा कर भाजपा सरकार ने ही भगवा किले की दीवार को दरका दिया है। चार सालों से दलित शोषित पीड़ित वंचित किसान सुनता मध्यम वर्ग असंतुष्ट है क्योंकि महसूस करने लगा है कि इस जुमलेबाजी में मैं कहाँ हूँ। यह वह असंतोष है जिसमें संसद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलने की कार्यवही ने चिंगारी दिखा कर विस्फोट करा दिया है। अब इस सरकार विरोधी सामाजिक उथलपुथल और आंदोलित मानस का लाभ लेने विपक्षी दल भी मैदान में उतर आये हैं जो भले अपने पक्ष में माहौल न बना पायें लेकिन भाजपा की भगवा किले की दीवार कमजोर कर ही देंगे। कुछ हिंदुत्ववादी तो कहने भी लगे हैं कि 2019 में यदि दो ढाई साल के लिए कमजोर सरकार आ भी गयी तो कोई मुस्लिम राष्ट्र तो घोषित कर नहीं देगी। ढाई वर्षों में फिर सरकार बदल देंगे लेकिन इनकी राजनीती ठीक करना जरूरी हो गया है।
अगले माह अन्ना हजारे आरक्षण विरोधी आंदोलन लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान में बैठने वाले हैं। भले अन्ना हजारे से सहानुभूति न हो लेकिन अपने सरोकारों के चलते सामान्य मध्यम वर्ग और पिछड़ा वर्ग भी उस आंदोलन में भाग लेगा इसी तरह मजदूरों का भी आंदोलन अगले माह है। कुछ अन्य दलों के छोटे बड़े अनेक राजनीतिक आंदोलन इसी का लाभ लेकर शुरू कर दिए जाने की अपेक्षा की जा सकती है। स्पष्ट नजर आ रहा है कि भाजपा आने वाले समय में उसी स्थिति से दो चार होने वाली है जो यूपीए सरकार ने अपने अंतिम वर्ष में देखी थी। लेकिन आम आदमी को कुछ न देने की नीयत के चलते भाजपा वर्तमान स्थिति से जीत पाने में असमर्थ नजर आती है क्योंकि इतना समय निकाल दिया गया है कि अब इनकी जीतने की योग्यता पर ही संदेह होने लगा है। नवंबर में आने वाले विधानसभा चुनावों में भगवा नक्शे के बीचों बीच कमजोरी के कारण बड़े छेद होने की आशंका नजर आती है।
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