Thursday, 13 February 2020

दिल्ली चुनाव : मेरा नजरिया

                                                    


महीने भर की वैचारिक जद्दोजहद के बाद दिल्ली चुनाव खत्म हुए जनता ने केजरीवाल को एक बार फिर न सिर्फ सत्तासीन किया बल्कि उनके भारतीय राजनिति में अस्तित्व पर मुहर भी लगा दी, अब मान लेना चाहिए कि आने वाले दशकों में केजरीवाल भारतीय राजनीती में न सिर्फ मौजूद रहने वाले हैं बल्कि दिल्ली की राजनीति का प्रमुख खिलाड़ी भी रहने वाले हैं। अब भविष्य में यह खिलाड़ी कितना खेलता हुआ पाया जायेगा कितना हिट विकेट होगा यह तो आने वाले समय में केजरीवाल की महत्वाकांक्षा और दिल्ली की जनता के बीच ही तय होगा। 

दिल्ली में केजरीवाल की जीत के क्या कारण रहे इस पर हर दृष्टिकोण से व्यापक चर्चा हो चुकी है। कुछ सही कुछ अनावश्यक कारणों पर कहीं सही कहीं अनावश्यक बारीकी से चर्चा हुई जिसमें भारीतय लोकतंत्र के मूल पैटर्न को नहीं छुआ गया वोटर की मानसिकता को समझने का प्रयास नहीं किया गया। सबसे ज्यादा दिल्ली के वोटर पर मुफ्तखोर असंवेंदनशील लालची होने का आरोप लगा। मेरी नजर में ऐसा आरोप लगा देना उचित नहीं है। हाँ दिल्ली का वोटर गैरजिम्मेदार और राष्ट्रीय मुद्दों पर असंवेदनशील हो सकता है बहुत ज्यादा अनरिज़नेबली डिमांडिंग और कर्त्तव्यों के प्रति लापरवाह हो सकता है और है भी, अपनी औकात से जयादा कंज़म्प्शन की निहित इच्छा रखता हो सकता है, लेकिन मुफ्तखोर और लालची का आरोप सही नहीं है। यदि दिल्ली के वोटर में यह आदत है तो यह आदत तो समूचे भारत के वोटर में है, बल्कि मैं तो कहूंगा कि एक वोटर के रूप में भारतीय मतदाता के बहुत बड़े वर्ग का मूल चरित्र ही मुफ्तखोरी है और यह मुफ्तखोरी सभी भारतीय राजनितिक दलों की देन है इसलिए दिल्ली के मतदाता पर यह आरोप लगाना उचित नहीं। 

लोकतंत्र में चुनाव राजनितिक राष्ट्रीय सुरक्षा आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर होते हैं। यह भारतीय लोकतंत्र की विडंबना है कि भारतीय राजनीतिज्ञों ने इस स्वरूप को इतना भोंथरा बना दिया है कि जनता ही किसी लालची याचक सी खड़ी नजर आती है। दिल्ली में 2019 लोकसभा के आम चुनाव राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर हुए थे क्योंकि तब दिल्ली की जनता को बिलकुल सामने एक खतरा एक नेता और एक दुश्मन नजर आ रहा था इसलिए दिल्ली ने सभी सातों सीटें नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा भाजपा को दी थीं। आज भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति जनता में वही विश्वास है कि यह नेता हमें हर खतरे से बचा लेगा इसलिए आज भी आम चुनाव हो जाएँ तो वोट मोदी को ही जायेगा लेकिन यहाँ परेशानी यह है कि जनता नहीं समझती कि एक दुश्मन है जो बराबर भारत को हजार जख्म देने के प्रयास में लगा हुआ है और दे रहा है और इस दुश्मन को सपोर्ट भारत के अंदर से मिलती है। यह समर्थन कुछ भारतीय राजनीतक दलों से, विशेष प्रकार के अभिजात्य वर्ग से, जिसमें कुछ कानून वाले हैं, कुछ शिक्षक हैं, चार विश्वविद्यालयों के कुछ छात्र हैं, एक अवार्ड वापसी टाइप गैंग है, और इनके पास एक भीड़ है जिसके कठमुल्ले लीडर हैं, और ये लोग पाकिस्तान और अन्य भारत विरोधी शक्तियों द्वारा संचालित निर्देशित और पोषित होते हैं। 

भारतीय जनता पार्टी यह बात गंभीरता से जनता को समझाने में असफ़ल रही है, बावजूद शाहीन बाग़ जैसी घटना सामने होने के असफल रही है क्योंकि भाजपा के दूसरी पंक्ति के अधिकांश नेता आलसी हैं छुटभैय्ये नेता बककड़ हैं और मिडिया और सोशल मीडिया सेल अभद्र आक्रामक नासमझ अदूरदर्शी लोगों से भरी पड़ी है जो नेतृत्व और दिशा देने के काम कर ही नहीं सकते। भाजपा की इसी कमी का केजरीवाल पार्टी ने न सिर्फ अवलोकन किया बल्कि इसी के बर अक्स अपनी चुनावी रणनीति भी तैयार की और उस पर काम किया। केजरीवाल ने यह भी भांप लिया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर वो मोदी का मुकाबला कर ही नहीं सकते बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर षड्यंत्रकारी गलतबयानी कर केजरीवाल ने अपनी साख़ पहले ही खत्म कर ली थी इसलिए केजरीवाल ने न राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा छेड़ा न ही राष्ट्रीय सुरक्षा के विश्वास बन चुके मोदी को ही छेड़ा। यहाँ तक कि विरोधियों के षड्यंत्रों से चल रहे शाहीन बाग़ धरने के आसपास भी नहीं फटके। 

केजरीवाल ने महसूस कर लिया था कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियाँ आम जनता को एक वर्ग के रूप में किसी तरह की राहत देने वाली नीतियाँ नहीं हैं बल्कि कभी सड़क सुरक्षा के नाम पर मोटे जुर्माने वसूलने कभी नए टैक्स और सेस के जरिये कभी जीवन की सामान्य जरूरतों पर मूल्य बढ़ाने वाली हैं जिनसे आम जनता न सिर्फ अप्रसन्न है बल्कि एक वर्ग के रूप में किसी तरह निजात चाहती है वही केजरीवाल ने किया। जनता को 200 यूनिट तक बिजली फ्री करने बीस हजार लीटर पानी फ्री करने महिलाओं की बस यात्रा मुफ़्त करने के साथ ही शिक्षा व्यवस्था में पहले से बेहतरी करने स्कूलों की हालत ठीक करने और मोहल्ला क्लिनिक द्वारा मिल रहे लाभ को भी बहुत प्रचारित किया। क्योंकि इसमें कुछ काम तो हुए थे और जनता को सुविधा के साथ साथ जेब में बचत भी पहुँच रही है तो लगभग 54 प्रतिशत जनता ने अपनी जेब को अहमियत देते हुए भाजपा के मुकाबले केजरीवाल को चुना। झारखंड हारने के बाद दिल्ली में अपनी प्रभावी मौजूदगी दर्ज न करा पाना भाजपा की आर्थिक नीतियों की पराजय है। जनता के टैक्स के पैसे से जो विकास कार्य कोई सरकार करती है यानि स्वास्थ्य शिक्षा बिजली सड़क पानी वही तो केजरीवाल सरकार ने जनता की नजर में बिना कोई अतिरिक्त पैसा लिए शुरू कर दिए हैं, तो आगे केजरीवाल की विजय को एक मॉडल की तरह भी देखा जा सकता है। 

अब प्रश्न उठता है कि क्या केजरीवाल एक बार फिर स्वयं को राष्ट्रिय स्तर पर ले जाकर मोदी का प्रतिद्व्न्दी बनने का प्रयास करेंगे तो मुझे लगता है यदि जरा भी विवेक बुद्धि है तो केजरीवाल अगले पाँच साल यह प्रयास नहीं करेंगे क्योंकि 2015 के चुनाव में ऐसी ही विजय के बाद केजरीवाल मोदी को टककर देने के चक्कर में मुँह के बल ऐसे गिरे थे कि उसके बाद यह चुनाव जीतने तक केजरीवाल हर चुनाव हार चुके हैं यहाँ तक कि छह माह पहले उनके राजनितिक अस्तित्व पर ही बड़ा प्रश्नचिन्ह लग गया था। संभव है महत्वाकांक्षा विवेक पर हावी हो भी जाये और विपक्ष में बैठे उनके मित्र उन्हें उकसाएं भी तब भी राहुल गाँधी प्रियंका गाँधी मायावती शरद पवार क्या विपक्ष का सर्वमान्य नेता स्वीकार करेंगे ? मुलायमसिंह यादव अखिलेश यादव और लालू यादव के परिवार के नाम इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि ये लोग सत्ता के समझौतों में कुछ भी स्वीकार कर सकते हैं। केजरीवाल का राष्ट्रीय पटल पर आविर्भाव तभी संभव है जब नेतृत्व विहीन कांग्रेस पार्टी केजरीवाल को अपना अध्यक्ष बना ले। 

कुछ समीक्षक प्रश्न उठा रहे हैं कि क्या केजरीवाल भाजपा की हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की राजनीती में सेंध लगा सकते हैं तो उस पर मेरा जवाब यही है कि बिलकुल भी नहीं। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व पनपता है एक आदर्श विचारधारा के साये में जिसे नाटक से पोषित नहीं किया जा सकता और केजरीवाल की राजनीती महज नाटक की राजनीती रही है जिसमें ऐसी पवित्र विचारधारा के लिए कोई जगह नहीं। केजरीवाल की आर्थिक नीतियों का लाभ लेने वाली और उनको वोट देने वाली जनता भी जानती है राष्ट्रीय सुरक्षा राष्ट्रवाद या हिंदुत्व के लिए नाटकों पर विश्वास नहीं किया जाता। अगर केजरीवाल के पिछले काम देखें तो अपने पंख फ़ैलाने के लिए दिल्ली के बाद सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बॉर्डर स्टेट्स गुजरात राजस्थान पंजाब को अपना कार्यक्षेत्र बनाने के लिए चुना, क्यों चुना ? खालिस्तानी समर्थकों से देश विदेश से पैसा लेने के आरोप, खालिस्तानी मूवमेंट के समर्थकों की सहायता से पंजाब का मुख्यमंत्री बनने के प्रयास का आरोप, JNU में जाकर टुकड़े टुकड़े गैंग का समर्थन करना टुकड़े टुकड़े गैंग पर मुकदमा चलाने की अनुमति न देना और अब शाहीन बाग में बग़ावत फ़ैलाने के लिए अपने मुसलमान नेता छोड़ देना,  यह सब यह बताने के लिए पर्याप्त है कि केजरीवाल न ही राष्ट्रवाद का सिपाही हो सकता है न हिंदुत्व का हामी। हाँ केजरीवाल धर्म से हिंदू नेता है जिसका प्रयोग उसने अब राजनीती के लिए भी करना शुरू किया है। 

भाजपा के हारने के कारण बहुत स्पष्ट हैं लेकिन भाजपा के सिवा यह सबको समझ आता है या फिर भाजपा और मोदी सरकार जानबूझ कर इन पर ध्यान नहीं देते। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी बहुत सी इनोवेटिव आर्थिक नीतियों टैक्स सेस डिजिटल पेमेंट और फाइव ट्रिलियन डॉलर इकोनोमी के ऑब्सेशन में यह भूल रहे हैं कि सुवधाएं और ईज़ ऑफ़ लिविंग लाइफ तो राष्ट्रवादियों को भी चाहिए हिंदुत्व के लिए भी जरूरी है। आमतौर पर राष्ट्रवादी भी एक सामान्य व्यक्ति है जो मेहनत कर के जैसे तैसे जीवन यापन कर रहा है। भले वह अपनी मेहनत से थोड़े बेहतर जीवन के लिए थोड़े साधन जुटा लेता है लेकिन आम राष्ट्रवादी को धन्ना सेठ नहीं है उसको भी राहत चाहिए जो सरकार न सिर्फ दे नहीं रही है बल्कि जीवनयापन को महंगा भी करती जा रही है। यही कारण है कि भाजपा एक के बाद एक उत्तर भारत में राज्यों से बाहर होती जा रही है। 

अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए भाजपा को राष्ट्रवाद को ईज़ ऑफ़ लिविंग लाइफ से जोड़ना होगा। वैसे भी मुफ्त की बहुत बड़ी बड़ी योजनाएं तो मोदी सरकार चला ही रही है उनमें पैसा गड्ढ़े में डालने की अपेक्षा कुछ ऐसी योजनाओं में डालना होगा जिनसे जनता को जाति वर्ग के अलावा एक आम आदमी की तरह कुछ प्राप्त हो। 
दूसरे भाजपा को हिंदुत्व को और अधिक असर्टिव करना होगा। यदि सभी विरोधियों सहित केजरीवाल को यह समझ आ सकता है कि हिदुत्व के बिना अब देश की राजनीती नहीं चल सकती तो इसके पीछे पहले से चलती आयी भाजपा की राजनीती है जिसे और आक्रामक करने की आवश्यकता है। बहुसंख्यक देशवासियों में यह विश्वास होना जरूरी है कि आजादी के बाद से ही देश और हिंदुओं को ब्लैकमेल करने वाले प्रेशर ग्रुप को अब सख्ती से कुचल दिया जायेगा। अशांति हिंसा और दंगा फ़ैलाने समूह को हमेशा के लिए दबा दिया जायेगा। मैसेज स्पष्ट करने के लिए सरकार लंबित पड़े कानून लाये जनसंख्या नियंत्रण पर नए सिरे से कानून लाये साथ ही अल्पसंख्यकों का आबादी में प्रतिशत निर्धरित हो। 

जहाँ तक कांग्रेस का प्रश्न है तो कांग्रेस जीतने के लिए चुनाव नहीं लड़ती ना इसके लिए कांग्रेस के पास न कोई नेता है न रणनीति न इच्छाशक्ति ही बची है। कांग्रेस का उद्देश्य महज इतना है कि किसी तरह भाजपा को सत्ता हासिल करने से रोक सके। लगता है धीरे धीरे इस काम की भी नहीं बचेगी। इसलिए कांग्रेस पार्टी के बारे में बात करना ही व्यर्थ है। हाँ केजरीवाल ऐसा नेता है जिसके पास राष्ट्रीय पार्टी नहीं है और कांग्रेस ऐसी पार्टी है जिसके पास नेता नहीं है अब ये दोनों एक दूसरे का पाणिग्रहण कर लें तब देखेंगे। 

2 comments:

  1. राष्ट्रवाद और हिंदुत्व पनपता है एक आदर्श विचारधारा के साये में जिसे नाटक से पोषित नहीं किया जा सकता और केजरीवाल की राजनीती महज नाटक की राजनीती रही है जिसमें ऐसी पवित्र विचारधारा के लिए कोई जगह नहीं।
    बहुत खूब अनुज जी, हमेशा की तरह विचारों को नयी दिशा देनेवाला आंकलन।

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  2. सारगर्भित विश्लेषण...साधुवाद🙏

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