Monday, 2 January 2017

गर्मा गर्म साल मुबारक


                                             



दोस्तों नया साल मुबारक। मुबारकबाद देते हुए सोच रहा हूँ कि किस बात की  मुबारकबाद ज्यादा  मौंजू रहेगी, गर्म जनवरी की या 50 दिन गुजरने की या पूरे 365 दिन गुजरने की।  बहरहाल 2016 ने 2017 में प्रवेश किया तो नया साल मुबारक।

वैसे  सर्दियों में गर्मी की शुरुआत तो दीवाली के बाद ही शुरू हो गयी थी जब आला हजरत ने काली क्रय शक्ति पर गर्मी दिखाते हुए नोटबंदी की घोषणा कर डाली कुछ दिन तक यह गर्मी सरकार और पार्टी में दिखाई देती रही फिर गर्मी नवयुवा प्रौढ़ युवराज में जा पहुँची लगे एटीम और बैंकों के चक्कर काटने युवराज की गर्मी धीरे धीरे बढ़ती गयी पर मजाल हो जो सरकार ने कांग्रेस सरकार की बात पर ध्यान दिया हो।  अपनी गर्मी की इस अनदेखी से बाबा भाई युवराज इतने नाराज हो गए कि 2016 की गर्मी कम करने किसी ठंडे देश चले गए।

जनता थोड़ा बाद में गर्मी में आयी लेकिन बेचारी साधारण जनता अपने को जनार्दन समझ कर गरमा गयी थी सो पुलिस की गर्मी ने जनता का भ्रम तोड़ कर ठंडा कर दिया।  गर्मायी तो चप्पल वाली दीदी भी थीं और बहुत गरमायीं, दिल्ली  के मर्यादा पुरुषोत्तम मफलर हाकिम से लगाकर बाबा युवराज तक सब दीदी की गर्मी से अपने हुक्कों में आग भरने लगे लेकिन बुरा हो धूलगढ़ के अमन प्रेमियों का जो फ़िलहाल नोटबंदी को जुबान बंदी तक खींच ले आये। बिहारी बाबू भी कुछ काम न आये।

गर्मी की गहमा गहमी यूपी पहुँची तो दिल्ली के करोलबाग के बैंक में ऐसी उठापटक जाहिर हो गयी कि यूपी की बहनजी की आक्रामकता रक्षात्मक होकर मोर्चे से सरक गयी, लेकिन इसी बीच समाजवाद इतना गरमाया कि लखनऊ से दिल्ली के निर्वाचन सदन तक समाजवाद ही समाजवाद तपता हुआ नजर आ रहा है। पर इस बीच सरकारी गर्मी कुछ ठंडी हुई दीख पड़ती है,  आला हजरत की नव वर्ष की बधाई से कुछ ऐसा ही लगा। खैर जी ये बड़े लोगों और जनार्दन, जिसे चुनाव के बाद महज जनता का ही दर्जा हासिल होता है, के बीच का मामला है जैसे तैसे सुलट ही लेंगे।

असल में इस गर्म सर्दी से कोई दिक्कत है तो मुझे है। प्रिय पत्नि ने अक्टूबर से पहले ही ठंड में मुझ तक गरमाई पहुँचाने के उद्देश्य से जो खूबसूरत रजाई बनवाई थी बेड पर सजी हुई है कभी ओढ़ता हूँ तो कभी फेंकता हूँ लेकिन बेड पर सजी रजाई के फ़ोटो खेंच कर पत्नि को भेजता रहता हूँ जिससे कम से कम उसे तो तसल्ली रहे। गर्म सर्दी के कारण चिड़ियों को भी हर जगह खाना उपलब्ध है तो जो दाने का भंडार मैंने उनके लिए लाकर रखा है वह भी कम ही खर्च हो रहा है। इसी कारण सामाजिकता पर असर यह हुआ कि अलाव जलाकर राजनितिक चर्चाएं जो इस दौर में सुनने को मिल जाती थीं उनका आभाव है। कुत्ते अभी तक नवंबर के धोखे में सारी रात रोते हैं और बस रोते ही रह जाते हैं। माहौल है कि नोटबंदी की कड़की के बावजूद खुशगवार चल है गाजर का हलवा मजेदार नहीं लगता रस्मअदायगी भर रह गया है ब्रांडी की तरफ़ देखने का मन नहीं होता। ऐसे ठिठुरन वाली तेज सर्दी को याद करता रहता हूँ। बारिश ही आ जाये तो कोई तो बदलाव महसूस हो यूँ तो 16 का 17 हो जाना बड़ा नीरस है। इसी नीरसता के बीच से नए साल की गरमागरम मुबारकबाद।


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