Monday, 9 January 2017

बेवजह की चर्चा

पहाड़ों में भारी बर्फबारी के बाद उधर से आती हवाओं ने मौसम कुछ ठंडा तो किया है। इधर भी सर्दी के ऐहसास ने चेहरों पर मुस्कान बिखेरी है। महिलाओं के सौंदर्य में सर्दी का मौसम हमेशा वृद्धि करता है यह भी एक अनुभव है जो सर्दियों की शाम उत्तर भारत के बाजारों में सहज अनुभव किया जा सकता है।

मेरी आदत ठंड को ठंड सा अनुभव करने की रही है सो जब तापमान 0 डिग्री से 12 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है मुझे मौसम अच्छा लगता है। हालाँकि मौसम अभी उतना सर्द हुआ नहीं है। जब हो जायेगा तब बेडरूम में 200 वाट का बल्ब लगा लूंगा। हीटर की तेज गर्मी सहन नहीं होती। जरूरत भी क्या है सर्दी को दोबारा गर्म करने की इसलिए कमरे में 3 या चार घण्टे जला बल्ब ही सुखद लगता है। एल ई डी लाइट्स के युग में झमाझम चमकती बल्ब की रौशनी कुछ अजीब लगती तो है लेकिन यदि साथ ही एल ई डी लाइट भी ऑन रखें तो सुनहरी सफ़ेद चमक सुखदायी है।

सम्बंधों पर जमी बर्फ़ के इलाज इतने आसान नहीं होते। जाने कैसे कब किस सम्बंध पर धीरे धीरे बर्फ़ की मोटी परत जम जाये कहा नहीं जा सकता। फिर यह परत न टूटती है न ही इसे तोड़ने इच्छा रह जाती है। यदि सम्बंधों पर जमी ठंडी परत टूट भी जाये तो बर्फ़ पर चटक सी लकीरें जैसे स्थायी हो जाती हैं। और जो इसे पिघला सके ऐसी आँच राख हुए रिश्तों में रहती नहीं।

दरअसल सम्बंधों का रख रखाव न तो कोई विज्ञान है न ही कला। यह नैसर्गिक अनुभव है जनित आवश्यकता है जो तत्काल होती है स्थायी होती है और शाश्वत है। यदि ऐसा नहीं है तो सम्बंध गैरजरूरी परिपाटी की तरह भी चलते जाते हैं जिनमे न सुखद शीतलता होती है न ज्वलंत आँच बस सम्बंध होते हैं क्योंकि वे कभी किसी कारणवश बन गए थे। कुछ सम्बंध दोस्ती या दुश्मनी के हम पिछले जन्मों से भी उठा लाते हैं लेकिन उनका होना सामान्य व्यवहार और जीवन में संभव नहीं होता।

ऐसे में यही कहूंगा कि किन्हीं सम्बंधों पर गर्व या अफ़सोस या शर्मिंदगी से बेहतर है उन्हें जस का तस आत्मसात कर लें। सम्बंधों के होने या ना होने की कला या विज्ञान पर समय लगाएंगे तो व्यर्थ ही होगा। सम्बंध अच्छे या बुरे क्षणिक या स्थायी व्यक्ति की सामर्थ्य से बाहर हैं।  

3 comments:

  1. नए ब्लॉग की शुरुआत पर बधाई ! वाकई प्रभावी लिखा है ! ऐसे ही लिखते रहिये !

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