Wednesday, 10 January 2018

सच्ची बात सदुल्ला कहे सबके मन से उतरा रहे

                                               अच्छा है दिल के पास रहे पासबाने अक़्ल
                                               लेकिन कभी कभी इसे तनहा भी छोड़ दे

इस शेर ने इतना तो साबित कर दिया कि ग़ालिब हुजूर का पासबाने अक़्ल बड़ा जिम्मेदार और कर्तव्य परायण था जो हुजूर के अनुशासनहीन आवारा दिल को भी खेंच खांच कर ठिकाने बैठाने का प्रयास तो करता ही था। इसी से आजिज़ आ कर ग़ालिब साब अक़्ल के पासबान को हड़काने का प्रयास कर रहे थे। कह नहीं सकता ग़ालिब साहब इसमें सफल हुए या नहीं। इधर अपनी स्थिति उलट है। हमारी अक़्ल का पासबान कदरन आवारा और अनुशासनहीन है एक बार आवारगी को निकल गया तो मजाल है कहीं आसपास भी नजर आये। रह जाते हैं बेचारे हम और हमारा दिल। और फिर दोनों को, फ़िराक़ साहब की शैली में कहूं तो एक ही काम रह जाता है, मैं दिल को रो लूं हूँ और दिल मुझको रो लेवे है। इस रुदनबाजी से झुंझला कर दिल ही दूर-पास से ढूंढ ढांढ कर अक़्ल के पासबान को घेर-घोट कर पकड़ लाया हालाँकि अक़्ल की आदत जानने के कारण हम इसके पक्ष में नहीं थे।

                                           इस बार पासबाने अक़्ल ने आते ही सबसे पहले हमें घूरा फिर दिल को और एक तुरत प्रश्न जड़ दिया : "ये एक साल 2017 पूरा का पूरा छोड़ा था तुम्हारे पास तुम दोनों ने क्या किया इसका ?" इस तरह की जवाबदेही हमें पसंद तो नहीं लेकिन औचक हमले से हम डिफेंसिव हो गये। "क्या करना था इसका", मैंने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा। "कुछ भी करते" पासबाने अक़्ल अकड़ने लगा "क्या अचीवमेंट है बताओ ?"  क्योंकि अब तक हमने खुद को व्यवस्थित कर लिया था इसलिए पलट अकड़ में कहा : देख भाई इस साल का अचीवमेंट बस इतना है कि इस साल भी जीवित हूँ और तुम्हारा काम है दिल के पास रहने का तो वही करो। पासबाने अक़्ल थोड़ा गत में आया ढीला हुआ और कहने लगा वो जो पिछले साल की राजनितिक लफ्फाजी चल रही थी उसका क्या हुआ। मैं भी खाली था बोला हे अक़्लरूपी धृतराष्ट्र अब मैं तुम्हें संजय की तरह नव वर्ष 2018 के आगमन का वृतांत सुनाता हूँ।

                                           जब 2017 शुरू हुआ तब उत्तम प्रदेश में समाजवाद उथल पुथल हो रहा था।  टीपू भैया नेताजी और चाचाजी से चलाने के लिए मांगी साईकिल उठाकर ले गए थे और लौटाने के नाम पर कह दिया था कि साईकिल मेरी है नेताजी की तरफ से मैंने खुद साईकिल की वसीयत अपने नाम लिख ली है लिहाजा साईकिल पर मेरा अधिकार है। नेताजी अभी मामले को समझने का दिखावा कर रहे थे और चाचाजी उन्हें चुनाव आयोग में धकेले दे रहे थे नतीजतन नेताजी झुंझला गए और आयोग से कह आये जिसे देनी हो साईकिल उसे ही दे दो मुझे इसकी जरूरत नहीं। आयोग ने देखा टीपू भैया साईकिल लिए बैठें हैं और कागजों के नाम पर छोटा हाथी भरकर वसीयत आयोग में ठेले दे रहे हैं। अंततः चुनाव आयोग ने खुद राहत की साँस लेने के लिए साईकिल टीपू भैया को ही थमा दी।

                                        चाचाजी भावुक होकर कसमें वादे प्यार वफ़ा गाते रह गए। टीपू भैया ने अपनी ही तरह के पढ़े लिखे नए मित्र को साईकिल पर बैठाया और चुनाव सड़क पर ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे गाते निकल लिए। सड़क में गड्ढे ज्यादा थे और मित्र का वजन साईकिल संभाल नहीं पा रही थी सो दोस्ती तो टूटती न टूटती साईकिल टूट गयी। अब टीपू भैया साईकिल की रिपेयर करते बैठे हैं कहते हैं पाँच साल लगेंगे जबकि उनका मित्र देश विदेश घूम रहा है। उत्तम प्रदेश में योगीजी के भगवा के आगे समाजवाद की लाली उतर गयी। दरअसल तो लाली क्या भगवा के सामने पीला हरा नीला हर रंग उतर गया। बहनजी ने सारा गुस्सा evm पर उतारना शुरू कर दिया। बहनजी का कहना है कि evm में नीला रंग भरा ही नहीं गया। चुनाव आयोग ने कहा हमने मशीन में कोई रंग नहीं भरा मशीन सफेद है खुद आकर देख लो लेकिन ऐसी बातें कौन सुने जबकि राजनीती ब जाते खुद लफ्फाजी प्रधान महकमा है।

                                           साल 2018 की शुरुआत ही धमाकेदार रही। ये धमाके दिसंबर के प्रथम सप्ताह में ही शुरू हो गए थे जब अखिल भारतीय राजनितिक पार्टी के अंतर्राष्ट्रीय इलीट भड़भड़िये ने प्रधानमंत्री को हिंदुस्तानी में गाली बकना शुरू कर दिया। मामला गुजरात चुनाव का था इसलिए भयभीत पार्टी ने तुरंत कार्यवाही दिखाने को अपने इलीट लीडर को निलंबित कर भी दिया लेकिन तीर कमान से निकल चुका था। खैर गुजरात चुनाव जीतना कांग्रेस के लिए संभव न था सो हार गयी। लेकिन चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस जातियों के जिस रथ पर चढ़ी वह या तो अंततः कांग्रेस को लेकर डूबेगा या देश को। फ़ैसला जनता को करना है कि अगले दो वर्षों में वह किसे डुबाना चाहेगी।

                                          आरक्षण रथ पर सवार होकर पटेलों का नेता बनने वाले फर्जी केजरीवाल का अपने क्षेत्र में लगभग वही हाल हुआ है जो गुजरात चुनाव में असली केजरीवाल का हुआ है। दरअसल नए नेतृत्व की छाँव में कांग्रेस की राजनीती उत्तर प्रदेश की बहनजी वाली होने लगी है। दलित मुस्लिम गठजोड़ के साथ अन्य जातियों का गठजोड़ बनाने का नया फ़ैसला अतिउत्साह और जल्दबाजी में लिया गया। बहुजन समाज पार्टी की तरह दलित मुस्लिम आधार को अपने पक्ष में स्थायतित्व देने का प्रयास  इसके मूल में है। कांग्रेस की ओर से घटता भाजपा की ओर खिसकता दलित वोट बैंक पार्टी के लिए गहन चिंता का विषय बन गया और इसी की भरपाई के लिए जल्दबाजी में जो फ़ैसला लिया गया है वह पार्टी के लिए भविष्य में जहर की खेती साबित हो सकता  हैं। जहाँ कांग्रेस को बाबू जगजीवन राम, बूटा सिंह या कांशीराम जैसे नेताओं की जरूरत थी वहाँ युवा अध्यक्ष दलितों का जाकिर नाइक पकड़ लाये हैं। यह निश्चित ही विस्फ़ोटक होगा। हिन्दू नाराज न हों इस वजह से आजकल मुसलमानों को साधने का काम विदेश जाकर किया जा रहा है। 1987 के बाद कांग्रेस फिर से दो नावों में पांव फँसा रही है यह बैक फायर भी कर सकता है।
                                         
                                             गुजरात हार के बाद कांग्रेस के पास जश्न मनाने का कोई कारण नहीं था लेकिन जश्न मनाया गया। जश्न मनाने के लिए रिप्रेज़ेंटेटिव फॉर्म ऑफ़ डेमोक्रेसी के मूल सिद्धांत, जो कि भारतीय संविधान में अंगीकृत है, का मजाक उड़ाया गया। कांग्रेसी प्रवक्ता कहने लगे भारत में बीजेपी 31 प्रतिशत वोट लेकर 69 प्रतिशत लोगों पर भी राज कर रही है। पीपुल्स रिप्रेजेंटेशन के सिद्धांत के अलोक में यह तर्क समझ से परे है। कांग्रेस कब 51 प्रतिशत वोट के साथ सत्ता में थी लोगों को याद नहीं जबकि इस बार गुजरात में भाजपा 50 प्रतिशत वोटों के साथ ही सरकार में आयी है। संभतः यह जश्न परम पराजित युवराज के यज्ञोपवीत संस्कार के उपरांत महाराज बनने पर था। महाराज के यज्ञोपवीत की फोटो हमने भी देखी, बंदगला कोट के ऊपर पहने थे। गुजरात हार को कांग्रेस मॉरल विक्ट्री कह कर खुश हो भी सकती है।

                                                  कांग्रेस की मॉरल विक्ट्री न भी हो लेकिन भाजपा की गुजरात विजय भी उत्साह वर्धक नहीं है। ईमानदारी से कहा जाये तो यह दिल तोड़ने वाली जीत है। हुजूरे आजम के राज्य में हुजूर का जलवा जितवा तो लाया लेकिन इसके बाद  सरकार की आर्थिक नीतियों पर जनता की नाराजगी की पोल खुल ही गयी है। दरअसल मनवांछित फॉरेन इन्वेस्टमेंट और मेक इन इंडिया न होने की वजह से लगता है हुजूरे आजम के खजाना वजीर अपने अहलकारों के साथ यह समझाने में सफल रहे कि अगर विदेश से उतना पैसा नहीं आ रहा तो क्यों न जनता की जेब से ही खींच लिया जाये वोट तो हुजूर के नाम पर आ ही रहा है। जनता की जेब में रखे पैसोँ पर हर संभव प्रहार हुआ। यह गलत है सताने वाला है तोड़ने वाला है चिढ़ाने वाला है। आज हालत यह है कि आम आदमी डरता है कहीं इस जेब से उस जेब में पैसे रखने पर टैक्स न लग जाये। आने वाले  भाजपा शासित राज्यों में जो चुनाव होने हैं उनमें भाजपा को नाकों चने चबाने पड़ सकते हैं। और ऐसा आम आदमी पर पड़े आर्थिक प्रहारों के चलते होगा। इसके अतिरिक्त स्थानीय कारण भी होंगे। अब हर राज्य तो मोदीजी का गृह राज्य है नहीं।

                                                     लेख लंबा हो रहा है लेकिन यहाँ अगर मैं आम आदमी पार्टी की बात नहीं करूंगा तो यह अधूरा ही रहेगा। पिछले हफ्ते कविवर कुमार विश्वास को देखा एक हारा हुआ टूटा राजनीतिज्ञ नजर आया हलांकि कवि वैसा ही था जैसा आंदोलन के दिनों में दीखता था। आखिर केजरीवाल ने एक और बलि ले ही ली। केजरीवाल और कुमार विश्वास के राजनितिक चरित्र में मूल अंतर है। अराजक क्रूसेडर एक पूर्णतः फोकस्ड राजनीतिज्ञ हैं वो राजनीती के लिए सिद्धांत छोड़ेंगे अपने ही बनाये नियम तोड़ेंगे बच्चों की झूठी कसमें खाएंगे  यार मारी करेंगे हर तरह का नाटक करेंगे लेकिन सत्ता का उदेश्य नहीं छोड़ेंगे। पैसे से सत्ता और सत्ता से पैसा वाले केजरीवाली जुमले में आज वह खुद उलझे हुए हैं, भ्रष्टाचार निकम्मेपन ओवर एम्बिशस होने के सभी आरोपों को क्रूसेडर महोदय जिस आसानी और बेशर्मी से सह जाते हैं यह सब कविवर के बसका नहीं है।

                                                        कविवर फाइटर नहीं है अनुशासित और फोकस्ड भी नहीं है यह लेखक कवियों शायरों का मूल दोष या गुण होता है। लेकिन कुमार विश्वास एक हद से आगे सिद्धांत नहीं तोड़ पाते एक हद के बाहर कैमरे पर पकड़ा जाने वाला झूठ भी नहीं बोल पाते। कविवर का केजरीवाल से लड़कर जीतना मुश्किल लगता है। हालाँकि दसों दिशाएं सात खंड हारने के बाद अब केजरीवाल के पास जीतने को कुछ नहीं है आगे है तो सिर्फ हार। इस सबके बावजूद कुमार विश्वास क्योंकि जीतने के लिए लड़ने वाला योद्धा नहीं हैं, सो केजरीवाल से जीतना मुश्किल लगता है। उनका पसंदीदा योद्धा अभिमन्यु है अर्जुन नहीं। यानि जीत हार से अलग शहीद होने भर की तमन्ना है। यद्यपि अवसरों से खाली नहीं हैं चाहें तो भाजपा में कभी भी जाकर नेता बन सकते हैं लेकिन उसमें सिर्फ एक नेता जितना ग्लैमर रह जायेगा जबकि विश्वास अगर चाहे तो केजरीवाल को हराने वाला मुख्यमंत्री पद का दावेदार हो सकते हैं। लेकिन कविवर इतना जिम्मेदारी भरा संघर्ष का बोझ उठाने को तैयार होंगे मुझे नहीं लगता।

                                                  कभी गिरते तो कभी गिर के संभलते रहते
                                                  बैठे रहने से तो बेहतर था के चलते रहते
                                                                                                                 (नईम अख्तर)



वादा  है कि कम से कम इस माह बहुत जल्दी जल्दी मिलूंगा।

3 comments:

  1. और इसी के साथ अनुज भाई की शानदार शतक के साथ वापसी, जबरदस्त..👍

    ReplyDelete
  2. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  3. अनुजजी आपकी पंक्तियां झकझोर कर देती है 'दलितों के जाकिर नाइक' 'उनके पसंदीदा योद्वा अभिमन्यु है अर्जुन नहीं' इसतरह की साहित्यीक विशेषताओं के साथ पिछले वर्ष की भारतीय राजनीती का समूचा लेखाजोखा अपने चीरपरीचीत अंदाज मे प्रस्तुत किया है आपने।

    ReplyDelete