Monday, 15 January 2018

मन की बात

मन की बात

                 


                           तुम्हारे पांवों के नीचे कोई जमीन नहीं 


ठहरते चलते  समय के साथ जाने कितना ठहरते जाने कितना चलते हम इतने सामाजिक तो हो गये हैं कि व्यक्ति को उसकी पीड़ा और निराशाओं के बीच घुटता हुआ छोड़ दिया है, मौन और अकेला। वही व्यक्ति जो जन्म से ही हमारे भीतर था जो हमारे साथ बड़ा हुआ जो स्वप्नदृष्टा था, रूमानी था जीवित भी था, तब तक जब तक कि हम दुनियादार नहीं हो गए। अब वही व्यक्ति भीतर ही भीतर तड़पता है चीखता है चुनौती देता है लेकिन हम मौन हैं, खुश हैं क्योंकि हम प्रतिक्रिया नहीं करते हमारी अभिव्यक्ति रुंध गयी है। दरअसल दुनियादार आदमी अभिव्यक्ति, रुमानियत और व्यक्तित्व के अंत का कब्रिस्तान है जहाँ सारी कब्रें सीमेंटेड हैं सभी एकरंग पुती हुई जिसके अभिशाप में व्यक्ति की अभिव्यक्ति और प्रतिक्रियाएं एकरस हैं। 


लोग अपने कष्टों कुंठाओं और निराशाओं को व्यक्त नहीं करते अभावों को भी नहीं भावों को भी नहीं। स्थिर सुख के नपे तुले भावों के साथ हर चेहरा नयी सभ्यता का अनजान वाहक बना नजर आता है जिसके पास पाने के लिए पूरा बाजारवाद है और खोने के लिए एक व्यक्ति ही था जिसे वह पहले ही दफ़ना आया है बिना इस बात की परवाह किये कि वह जीवित था या मृत। वह इस बात से भी चिंतित नहीं है कि कहीं भविष्य में उसके भीतर दफ़्न यही आदमी कभी बाहर निकल आया तो कैसे हैंडल करेंगे ? क्या फिर एक हत्या होगी ? दुनियादार आदमी इस भ्रम को आत्मसात कर चुका है कि वह बाहर भीतर का भेद मिटा चुका है। अपनी प्रतिक्रिया के लिए वह बाजार की ओर झांकता है जहाँ कोई बाजारू खबरिया चैनल उसकी प्रतिक्रिया को निर्देशित और नियंत्रित करता है जो मीडिया ब जाते खुद दुनिया के किसी कोने में बैठे किसी बड़े कॉर्पोरेट हॉउस से निर्देशित और नियंत्रित है। 


अब प्रतिक्रिया समाज के कोढ़ बाबाओं की बड़ी गाड़ियों विलासितापूर्ण रहन सहन भव्य महलों और महलों सी ही सजीधजी रूपवान चेलियों के लावण्य और उनके बाबाओं से अंतरंग फंतासी प्रधान संबंधों पर होती है। प्रतिक्रिया मनोरंजन बन चुकी है, अभिव्यक्ति भी। हम संवेदनाओं और ऐहसास के लिये बाजार पर निर्भर हैं चिंताओं और चिंतन के लिये भी। कॉर्पोरेट को मुनाफ़ा देने वाले प्रमुख विषय, प्रमुख चिंताओं का विषय बन गए हैं जिनके सच और झूठ दोनों के बीच पैसों का बड़ा ढेर है जो न झूठ को छिपने देता है न सच को बाहर आने देता है इन्हीं सबके बीच हम पढ़ते सुनते हैं ग्लोबल वार्मिंग और आइस ऐज, इन्हीं के बीच हमारी चिंताएं बाघों की संख्या और उनके बचाव संवर्धन पर जा टिकती है फिर हमें बताया जाता है पर्यावरण और हम मनोरंजन की तरह चिंता करते हैं।

बदलाव के दौर में बाजार नियंत्रित चिंता और चिंतन मनोरंजन बन गया है जिसे ड्रॉइंगरूम या बेडरूम में हम अपनी ग्राह्यता के हिसाब से पचा रहे हैं। यानि अब हम महज एक कूड़ादान होकर रह गए हैं जिसमें बाजार हमारी ग्राह्य शक्ति के अनुसार अपनी इच्छा की वस्तुएं, विचार, क्रिया, प्रितिक्रिया, संवेदनशीलता, भाव और अभिव्यक्ति भी डालता जाता है। आपको गलतफ़हमी हो सकती है कि मैं बाजारवाद का विरोध कर रहा हूँ किंतु यह सच नहीं है। दरअसल तो मैं व्यक्तियों में से खो चुके व्यक्तित्व और आदमी के अंदर लुप्त हो गए आदमी पर हैरान हूँ। जहां समाज एकरस है, ऐहसास अभिव्यक्ति एकरस हैं सबकुछ "कंट्रोल्ड बाई अदर्स है"  व्यक्ति के नपे तुले ऐहसास नपी तुली संवेदनाएं नपी तुली खुशियाँ और नपे तुले ग़म बाहर आ रहे हैं। इस सबके बीच सबसे अधिक अभिव्यक्ति की एकरसता सालती है। सभी एक सा ही कैसे महसूस कर सकते हैं एक सा ही कैसे लिख सकते हैं लेकिन एक सा ही महसूस किया जा रहा है लिखा भी जा रहा है। एक ही जैसा से मेरा अर्थ यहाँ कॉपी पेस्ट से नहीं है बल्कि उन सीमाओं से है जिनमें अभिव्यक्ति बंध गयी है। 


इसी माह के प्रथम सप्ताह अपने वरिष्ठ कवि मित्र से बंधी हुई अभिव्यक्तियों के खालीपन पर चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था लोग कुंठित हैं निराश हैं। मेरा प्रतिवाद था कि यदि कुंठित या निराश होते अवश्य कुछ मौलिक कुछ नया लिखते। दरअसल तो न इन्हें कोई पीड़ा है न निराशा न कुंठा ही है क्योंकि यदि ऐसा होता तो ये मौलिक आंदोलित करने वाला दिल दिमाग़ के किसी कोने में कुछ ठहरता सा लिखते। वो कहना चाहते थे वास्तविकता की कुंठाओं ने छोटे शहरों में लेखन को जकड़ लिया है। मेरा आक्रोश लेखन में अभिव्यक्ति को मनोरंजन बना लेने से था जबकि छोटे शहरों में विलुप्त होती जा रही लेखन की ईमानदारी पर हम दोनों सहमत थे। आज मौलिक ईमानदार लेखन बड़े शहरों तक सीमित होकर रह गया है चाहे वे स्टेट मेट्रो सिटीज़ हों या नेशनल मेट्रो सिटीज़ हों, सुविधाओं और उपलब्धताओं के चलते सभी लेखन जिसे लेखन कहा जा सके मैट्रोज़ की संपदा बन चुका है। एक तो इसलिए कि वहाँ बड़े छापेखानों के चलते तमाम बड़े लेखक कवि पत्रकार आजादी के बाद से ही नए रास्ते खोल चुके थे स्थापित हो चुके थे दूसरे इन बड़े लेखकों के बाद संपादकों और प्रकाशकों ने अन्य लेखक बना दिए जो आज मौलिक ईमानदार लेखक न सही नामचीन स्थापित लेखक तो हैं। 


स्थापित लेखक जब जीवकोपार्जन के लिये मेट्रो सिटीज़ में आये तो अपने चिंतन में ग्रामीण जीवन और संस्कृति भी ले आये जिसे उन्होंने कागज़ों पर उकेरा क्योंकि यह सबकुछ वही था जो उन्होंने जिया था अनुभव किया था, उनका चिंतन और लेखन व्यक्ति की समस्याओं के प्रति ईमानदार रहा, समाज को झकझोरता रहा। लेखन की यह ईमानदारी तब भी रही जब उन्होंने मेट्रो सिटी के अर्बनाइज़्ड जीवन और उसमें अपने घुलमिल जाने के बीच आयी समस्याओं और जीवन की वसिंगतियों विद्रूपताओं को दर्पण दिखाया। छोटे शहरों में सब्जेक्ट की इन  सुविधाओं का अभाव  झलकता है, ईमानदारी का भी। क्योंकि इन शहरों में ग्रामीण और शहरी जीवन घुलमिल गए हैं जहां मेट्रो सिटीज़ जैसी चंद सुविधाओं और बहुत सी अलामतों के बीच जीवन गड्ड मड्ड हो चला है। इन सबके बीच लेखक या कवि सब्जेक्ट के आभाव से जूझ रहा है, यह अभाव तब और मुखर हो जाता है जब इन शहरों का लेखक गांवों से जुड़ा नहीं होता। नतीजतन वह लेखन की अपेक्षा कविताओं को तरजीह देने लगता है। त्रासदी यह है कि कविताओं में संदेश एवं अभिव्यक्ति की ईमनदारी का न उसे ऐहसास है न उसके प्रति कोई रूचि। 

कवियों ने अपनी रूचि और सुविधानुसार बनावटी शैली पकड़ ली है जिसमें सब्जेक्ट नहीं होता अभिव्यक्ति भी नहीं, बस दीख पड़ता है तो सुंदर आडंबरपूर्ण शब्दों का सुगठित विन्यास जो न समाज के किसी पक्ष से जुड़ा है न व्यक्तिगत अनुभवों, एहसासों, प्रतिक्रियाओं को ही अभिव्यक्त करता है जिसके चलते कविता बाँझ हो गयी है। वोकैबुलरी सीमित है और अभिव्यक्ति स्वयं के लिए भी ढाई घंटे की फिल्म सा मनोरंजन है। सोशल मीडिया ऐसे कवियों से भरा पड़ा है कुछ तो एक दिन में दस बीस तक कविताएं लिख रहे हैं जबकि उन्होंने पूरे जीवन दस कवि भी नहीं पढ़े होंगे। इन सबके बीच अपवाद स्वरूप जो लेखक कवि निकल रहे हैं वो राष्ट्रिय स्तर पर भी नजर आते ही हैं। दूसरी ओर लेखकों की गिरती संख्या ने पत्र पत्रिकाओं को भी प्रभावित किया है।

प्रेम और प्रणय भी सामाजिक मानदंडों के अनुरूप परिपक्व हो गए हैं। अब ब्रेकअप होने पर व्यक्ति द्वारा पहले सी रुमानियत वाला हो हल्ला नहीं होता प्रेम में होने वाली आत्महत्याओं की जगह एकतरफा प्रेम में होने वाली हत्याओं या ऑनर किलिंग ने ले ली है लिव इन रिलेशनशिप प्रेम विवाह का विकल्प बनकर उभरी है। संवेदनाएं वक़्ती हैं और बेहिस भी। अस्पतालों में मरीजों के उकताए हुए तीमारदार दूसरे मरीजों को देखकर कुछ क्षण मनोरंजन रूपी संवेदनाएं व्यक्त करते हैं फिर मोबाइल फोन में सोशल मीडिया पर व्यस्त हो जाते हैं। इंटरनेट क्रांति और मोबाइल क्रांति के कारण दुनिया के छोटे होने ने लोगों को छोटा बहुत छोटा कर दिया है। संक्रमण काल में समाज और व्यक्ति के बाहर भीतर का अंतर सच में बौना हो चला है।  ऐसे में किस जगह किस बदलाव से कितनी सकारात्मकता की अपेक्षा की जाये इसे भविष्य पर छोड़ते हुए फ़िलहाल दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल के एक शेर से अंत करूंगा :

                                                  तुम्हारे पांवों के नीचे कोई जमीन नहीं 
                                                  कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं 


                                                                                                                 "फ़तेह"

Saturday, 13 January 2018

प्रेस कांफ्रेंस

                                               हास्य कविता 



मुझको भी नेता बनवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
गद्दी नंबर एक दिला दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 


चुप चुप रहते केजरीवाल मफलर हट गया खुले हैं बाल 
कुमार विश्वास लगावे जोर कपिल मिश्रा मचा रहा शोर 
गुप्ता को राजयसभा भिजवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
कपिल - कुमार को चुप करवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 


भगवा ने किया है बुरा हाल दीदी डर गयी हँसे बंगाल 
ये कैसा हो गया फजीता पंडितों में बंट रही है गीता 
भाजपा की रफ्तार घटा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
शुरू फिर से इफ्तार करा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 


अध्यक्ष हो गए राहुल भैया कांग्रेस की डूब रही  नैया 
मंदिर पूजा और जनेऊ फिर भी सत्ता हाथ न देहू 
मेरा कर्नाटक बचवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
बहरीन से संदेसा भिजवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 


योगी जी ने डंडा उठाया उत्तर प्रदेश पकड़ में आया 
बहनजी अखिलेश  मचावें शोर ईवीएम वोटों की चोर 
ईवीएम को बंद करा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
बैलेट पेपर फिर चलवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 


मोदीजी भी  हैं परेशान जीत गए पर मिला न मान 
जीएसटी की मार देख ली ले के बैठ गया अरुण जेटली 
जेटली से पीछा छुड़वा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
कर्नाटक सरकार दिला दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 


खाली बैठे हो रहे बोर ट्विटर पे मिलते साँझ और भोर 
हमको भी कोई काम दिला दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
कामचलाऊ पद दिलवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 
मेरी प्रेस कांफ्रेंस करवा दो वरना प्रेस कांफ्रेंस कर दूंगा 

Wednesday, 10 January 2018

सच्ची बात सदुल्ला कहे सबके मन से उतरा रहे

                                               अच्छा है दिल के पास रहे पासबाने अक़्ल
                                               लेकिन कभी कभी इसे तनहा भी छोड़ दे

इस शेर ने इतना तो साबित कर दिया कि ग़ालिब हुजूर का पासबाने अक़्ल बड़ा जिम्मेदार और कर्तव्य परायण था जो हुजूर के अनुशासनहीन आवारा दिल को भी खेंच खांच कर ठिकाने बैठाने का प्रयास तो करता ही था। इसी से आजिज़ आ कर ग़ालिब साब अक़्ल के पासबान को हड़काने का प्रयास कर रहे थे। कह नहीं सकता ग़ालिब साहब इसमें सफल हुए या नहीं। इधर अपनी स्थिति उलट है। हमारी अक़्ल का पासबान कदरन आवारा और अनुशासनहीन है एक बार आवारगी को निकल गया तो मजाल है कहीं आसपास भी नजर आये। रह जाते हैं बेचारे हम और हमारा दिल। और फिर दोनों को, फ़िराक़ साहब की शैली में कहूं तो एक ही काम रह जाता है, मैं दिल को रो लूं हूँ और दिल मुझको रो लेवे है। इस रुदनबाजी से झुंझला कर दिल ही दूर-पास से ढूंढ ढांढ कर अक़्ल के पासबान को घेर-घोट कर पकड़ लाया हालाँकि अक़्ल की आदत जानने के कारण हम इसके पक्ष में नहीं थे।

                                           इस बार पासबाने अक़्ल ने आते ही सबसे पहले हमें घूरा फिर दिल को और एक तुरत प्रश्न जड़ दिया : "ये एक साल 2017 पूरा का पूरा छोड़ा था तुम्हारे पास तुम दोनों ने क्या किया इसका ?" इस तरह की जवाबदेही हमें पसंद तो नहीं लेकिन औचक हमले से हम डिफेंसिव हो गये। "क्या करना था इसका", मैंने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा। "कुछ भी करते" पासबाने अक़्ल अकड़ने लगा "क्या अचीवमेंट है बताओ ?"  क्योंकि अब तक हमने खुद को व्यवस्थित कर लिया था इसलिए पलट अकड़ में कहा : देख भाई इस साल का अचीवमेंट बस इतना है कि इस साल भी जीवित हूँ और तुम्हारा काम है दिल के पास रहने का तो वही करो। पासबाने अक़्ल थोड़ा गत में आया ढीला हुआ और कहने लगा वो जो पिछले साल की राजनितिक लफ्फाजी चल रही थी उसका क्या हुआ। मैं भी खाली था बोला हे अक़्लरूपी धृतराष्ट्र अब मैं तुम्हें संजय की तरह नव वर्ष 2018 के आगमन का वृतांत सुनाता हूँ।

                                           जब 2017 शुरू हुआ तब उत्तम प्रदेश में समाजवाद उथल पुथल हो रहा था।  टीपू भैया नेताजी और चाचाजी से चलाने के लिए मांगी साईकिल उठाकर ले गए थे और लौटाने के नाम पर कह दिया था कि साईकिल मेरी है नेताजी की तरफ से मैंने खुद साईकिल की वसीयत अपने नाम लिख ली है लिहाजा साईकिल पर मेरा अधिकार है। नेताजी अभी मामले को समझने का दिखावा कर रहे थे और चाचाजी उन्हें चुनाव आयोग में धकेले दे रहे थे नतीजतन नेताजी झुंझला गए और आयोग से कह आये जिसे देनी हो साईकिल उसे ही दे दो मुझे इसकी जरूरत नहीं। आयोग ने देखा टीपू भैया साईकिल लिए बैठें हैं और कागजों के नाम पर छोटा हाथी भरकर वसीयत आयोग में ठेले दे रहे हैं। अंततः चुनाव आयोग ने खुद राहत की साँस लेने के लिए साईकिल टीपू भैया को ही थमा दी।

                                        चाचाजी भावुक होकर कसमें वादे प्यार वफ़ा गाते रह गए। टीपू भैया ने अपनी ही तरह के पढ़े लिखे नए मित्र को साईकिल पर बैठाया और चुनाव सड़क पर ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे गाते निकल लिए। सड़क में गड्ढे ज्यादा थे और मित्र का वजन साईकिल संभाल नहीं पा रही थी सो दोस्ती तो टूटती न टूटती साईकिल टूट गयी। अब टीपू भैया साईकिल की रिपेयर करते बैठे हैं कहते हैं पाँच साल लगेंगे जबकि उनका मित्र देश विदेश घूम रहा है। उत्तम प्रदेश में योगीजी के भगवा के आगे समाजवाद की लाली उतर गयी। दरअसल तो लाली क्या भगवा के सामने पीला हरा नीला हर रंग उतर गया। बहनजी ने सारा गुस्सा evm पर उतारना शुरू कर दिया। बहनजी का कहना है कि evm में नीला रंग भरा ही नहीं गया। चुनाव आयोग ने कहा हमने मशीन में कोई रंग नहीं भरा मशीन सफेद है खुद आकर देख लो लेकिन ऐसी बातें कौन सुने जबकि राजनीती ब जाते खुद लफ्फाजी प्रधान महकमा है।

                                           साल 2018 की शुरुआत ही धमाकेदार रही। ये धमाके दिसंबर के प्रथम सप्ताह में ही शुरू हो गए थे जब अखिल भारतीय राजनितिक पार्टी के अंतर्राष्ट्रीय इलीट भड़भड़िये ने प्रधानमंत्री को हिंदुस्तानी में गाली बकना शुरू कर दिया। मामला गुजरात चुनाव का था इसलिए भयभीत पार्टी ने तुरंत कार्यवाही दिखाने को अपने इलीट लीडर को निलंबित कर भी दिया लेकिन तीर कमान से निकल चुका था। खैर गुजरात चुनाव जीतना कांग्रेस के लिए संभव न था सो हार गयी। लेकिन चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस जातियों के जिस रथ पर चढ़ी वह या तो अंततः कांग्रेस को लेकर डूबेगा या देश को। फ़ैसला जनता को करना है कि अगले दो वर्षों में वह किसे डुबाना चाहेगी।

                                          आरक्षण रथ पर सवार होकर पटेलों का नेता बनने वाले फर्जी केजरीवाल का अपने क्षेत्र में लगभग वही हाल हुआ है जो गुजरात चुनाव में असली केजरीवाल का हुआ है। दरअसल नए नेतृत्व की छाँव में कांग्रेस की राजनीती उत्तर प्रदेश की बहनजी वाली होने लगी है। दलित मुस्लिम गठजोड़ के साथ अन्य जातियों का गठजोड़ बनाने का नया फ़ैसला अतिउत्साह और जल्दबाजी में लिया गया। बहुजन समाज पार्टी की तरह दलित मुस्लिम आधार को अपने पक्ष में स्थायतित्व देने का प्रयास  इसके मूल में है। कांग्रेस की ओर से घटता भाजपा की ओर खिसकता दलित वोट बैंक पार्टी के लिए गहन चिंता का विषय बन गया और इसी की भरपाई के लिए जल्दबाजी में जो फ़ैसला लिया गया है वह पार्टी के लिए भविष्य में जहर की खेती साबित हो सकता  हैं। जहाँ कांग्रेस को बाबू जगजीवन राम, बूटा सिंह या कांशीराम जैसे नेताओं की जरूरत थी वहाँ युवा अध्यक्ष दलितों का जाकिर नाइक पकड़ लाये हैं। यह निश्चित ही विस्फ़ोटक होगा। हिन्दू नाराज न हों इस वजह से आजकल मुसलमानों को साधने का काम विदेश जाकर किया जा रहा है। 1987 के बाद कांग्रेस फिर से दो नावों में पांव फँसा रही है यह बैक फायर भी कर सकता है।
                                         
                                             गुजरात हार के बाद कांग्रेस के पास जश्न मनाने का कोई कारण नहीं था लेकिन जश्न मनाया गया। जश्न मनाने के लिए रिप्रेज़ेंटेटिव फॉर्म ऑफ़ डेमोक्रेसी के मूल सिद्धांत, जो कि भारतीय संविधान में अंगीकृत है, का मजाक उड़ाया गया। कांग्रेसी प्रवक्ता कहने लगे भारत में बीजेपी 31 प्रतिशत वोट लेकर 69 प्रतिशत लोगों पर भी राज कर रही है। पीपुल्स रिप्रेजेंटेशन के सिद्धांत के अलोक में यह तर्क समझ से परे है। कांग्रेस कब 51 प्रतिशत वोट के साथ सत्ता में थी लोगों को याद नहीं जबकि इस बार गुजरात में भाजपा 50 प्रतिशत वोटों के साथ ही सरकार में आयी है। संभतः यह जश्न परम पराजित युवराज के यज्ञोपवीत संस्कार के उपरांत महाराज बनने पर था। महाराज के यज्ञोपवीत की फोटो हमने भी देखी, बंदगला कोट के ऊपर पहने थे। गुजरात हार को कांग्रेस मॉरल विक्ट्री कह कर खुश हो भी सकती है।

                                                  कांग्रेस की मॉरल विक्ट्री न भी हो लेकिन भाजपा की गुजरात विजय भी उत्साह वर्धक नहीं है। ईमानदारी से कहा जाये तो यह दिल तोड़ने वाली जीत है। हुजूरे आजम के राज्य में हुजूर का जलवा जितवा तो लाया लेकिन इसके बाद  सरकार की आर्थिक नीतियों पर जनता की नाराजगी की पोल खुल ही गयी है। दरअसल मनवांछित फॉरेन इन्वेस्टमेंट और मेक इन इंडिया न होने की वजह से लगता है हुजूरे आजम के खजाना वजीर अपने अहलकारों के साथ यह समझाने में सफल रहे कि अगर विदेश से उतना पैसा नहीं आ रहा तो क्यों न जनता की जेब से ही खींच लिया जाये वोट तो हुजूर के नाम पर आ ही रहा है। जनता की जेब में रखे पैसोँ पर हर संभव प्रहार हुआ। यह गलत है सताने वाला है तोड़ने वाला है चिढ़ाने वाला है। आज हालत यह है कि आम आदमी डरता है कहीं इस जेब से उस जेब में पैसे रखने पर टैक्स न लग जाये। आने वाले  भाजपा शासित राज्यों में जो चुनाव होने हैं उनमें भाजपा को नाकों चने चबाने पड़ सकते हैं। और ऐसा आम आदमी पर पड़े आर्थिक प्रहारों के चलते होगा। इसके अतिरिक्त स्थानीय कारण भी होंगे। अब हर राज्य तो मोदीजी का गृह राज्य है नहीं।

                                                     लेख लंबा हो रहा है लेकिन यहाँ अगर मैं आम आदमी पार्टी की बात नहीं करूंगा तो यह अधूरा ही रहेगा। पिछले हफ्ते कविवर कुमार विश्वास को देखा एक हारा हुआ टूटा राजनीतिज्ञ नजर आया हलांकि कवि वैसा ही था जैसा आंदोलन के दिनों में दीखता था। आखिर केजरीवाल ने एक और बलि ले ही ली। केजरीवाल और कुमार विश्वास के राजनितिक चरित्र में मूल अंतर है। अराजक क्रूसेडर एक पूर्णतः फोकस्ड राजनीतिज्ञ हैं वो राजनीती के लिए सिद्धांत छोड़ेंगे अपने ही बनाये नियम तोड़ेंगे बच्चों की झूठी कसमें खाएंगे  यार मारी करेंगे हर तरह का नाटक करेंगे लेकिन सत्ता का उदेश्य नहीं छोड़ेंगे। पैसे से सत्ता और सत्ता से पैसा वाले केजरीवाली जुमले में आज वह खुद उलझे हुए हैं, भ्रष्टाचार निकम्मेपन ओवर एम्बिशस होने के सभी आरोपों को क्रूसेडर महोदय जिस आसानी और बेशर्मी से सह जाते हैं यह सब कविवर के बसका नहीं है।

                                                        कविवर फाइटर नहीं है अनुशासित और फोकस्ड भी नहीं है यह लेखक कवियों शायरों का मूल दोष या गुण होता है। लेकिन कुमार विश्वास एक हद से आगे सिद्धांत नहीं तोड़ पाते एक हद के बाहर कैमरे पर पकड़ा जाने वाला झूठ भी नहीं बोल पाते। कविवर का केजरीवाल से लड़कर जीतना मुश्किल लगता है। हालाँकि दसों दिशाएं सात खंड हारने के बाद अब केजरीवाल के पास जीतने को कुछ नहीं है आगे है तो सिर्फ हार। इस सबके बावजूद कुमार विश्वास क्योंकि जीतने के लिए लड़ने वाला योद्धा नहीं हैं, सो केजरीवाल से जीतना मुश्किल लगता है। उनका पसंदीदा योद्धा अभिमन्यु है अर्जुन नहीं। यानि जीत हार से अलग शहीद होने भर की तमन्ना है। यद्यपि अवसरों से खाली नहीं हैं चाहें तो भाजपा में कभी भी जाकर नेता बन सकते हैं लेकिन उसमें सिर्फ एक नेता जितना ग्लैमर रह जायेगा जबकि विश्वास अगर चाहे तो केजरीवाल को हराने वाला मुख्यमंत्री पद का दावेदार हो सकते हैं। लेकिन कविवर इतना जिम्मेदारी भरा संघर्ष का बोझ उठाने को तैयार होंगे मुझे नहीं लगता।

                                                  कभी गिरते तो कभी गिर के संभलते रहते
                                                  बैठे रहने से तो बेहतर था के चलते रहते
                                                                                                                 (नईम अख्तर)



वादा  है कि कम से कम इस माह बहुत जल्दी जल्दी मिलूंगा।

Sunday, 15 January 2017

भय ज्ञान की उतपत्ति का प्रमुख कारण है

गलती सरासर मेरी थी। ट्विटर पर कहता रहा यह ब्लॉग हल्के फुल्के मूड़ में रोजमर्रा टाइप के पठन पाठन के लिए रख छोड़ा है लेकिन ब्लॉग में स्पष्ट नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि मेरे कुछ मित्र मेरी निठल्लेपन की लफ्फाजी में गहन साहित्य ढूंढने का प्रयास करते रहे पर साहित्य न तो था न मित्र पाठकों को मिला। इससे नाराज होकर उन्होंने समीक्षक का रूप धारण कर लिया और कह दिया कुछ लिखने से रह गया है या दो अलग अलग कहानी हैं। क्या बताऊं कि यह कहानी है ही नहीं और जब मेरे पास लिखने को ही कुछ नहीं था तो छोड़ने को क्या होता। खैर मैं उनका शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने सरसरी पोस्ट में गहन मगजपच्ची की। मित्रों के समीक्षक होने पर मैं भले शंकित हूँ उनके ज्ञान पर मुझे कोई संदेह नहीं है।

दरअसल भारत ज्ञान प्रधान देश है। भले हमारे पास करने को काम न हो खाने को रोटी न हो बाँटने को ज्ञान भरपूर है और यह काम हम पूरी निष्ठा से करते आये हैं। वैदिक काल में ज्ञान देने का काम ऋषि मुनि लोग किया करते थे वर्तमान युग में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। कौन कब कहाँ से ज्ञान ठेल जाये पता नहीं चलता। बाहर तो छोड़िये घर में बैठे आदमी पर भी पत्नि बच्चे ज्ञान ठेलना शुरू कर देते हैं इन सब से बच बचा कर सोशल मीडिया या टीवी की शरण में चला गया तो ज्ञान की मिक़दार कई गुना बढ़ जाती है। कल मेरे साथ ऐसा ही हुआ। हुआ यूँ कि टीवी ऑन ही किया था कि विज मंत्री गाँधी दर्शन पर "व्यक्तिगत" ज्ञान देते नजर आये। ज्ञान इतना मौलिक था कि इसे सुनकर RBI बिल्डिंग की भव्य दीवारें थरथरा गयीं कुबेर भगवान की मूर्ति ने तो अदृश्य होने का ही मन बना लिया था। मंत्री जी ने ज्ञान दिया था कि खादी की दुर्दशा से लेकर नोट की दुर्दशा तक गांधीजी का नाम और फोटो जिम्मेदार है। इस मौलिक ज्ञान का झटका अनेक पूर्व वित्तमंत्रियों और RBI गवर्नरों को जरूर लगा होगा कि यह ज्ञान पहले क्यों नहीं मिला। झटका तो भाजपा को भी दिल्ली से लेकर लगा हरयाणा तक लगा लेकिन मंत्री जी ने तटस्थता से ज्ञान को बयान बताकर वापस ले लिया। अब यह कहाँ से कितना वापस गया जनता को समझ नहीं आया।

मूलतः हरयाणा से होने के कारण मैं हरयाणा ब्रिगेड की ज्ञानदायिनी सलाहियत से पूर्णतः वाकिफ़ रहा हूँ। हरयाणा वाले ज्ञान लेते नहीं पर मौलिक ज्ञान की सप्लाई जरूर कर देते हैं। विश्वास ना हो तो अपने दिल्ली वाले माननीय मफ़लर मैन महोदय को ही देख लीजिये वो भी मूलतः हरयाणा से हैं और भारतीय राजनीती में कुटाई और स्याही की महिमा का जो सात्विक ज्ञान उन्होंने दिया है उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती। ऐसा ही ज्ञान मफ़लर बाबू साल के पहले दिन रोहतक में में दे रहे थे इससे युग नायक श्री केजरी महाराज का एक हरयाणवी भक्त इतना अभिभूत हुआ कि जवाब में उनको जूते से ज्ञान सप्लाई कर डाला। युग नायक ने तत्काल कह दिया यह भक्त मेरा नहीं मोदी का है। दरअसल भक्त का निशाना चूक गया था और केजरी बाबू को अपने भक्तों पर पूरा विश्वास है कि उनका निशाना नहीं चूकता। अब दिल्ली वाले भक्त ऑटो ड्राइवर लाली भाईसाब का ही उदाहरण देखिये क्या निशाना ताक कर उन्होंने सत्याग्रही तमाचे का ज्ञान दिया था अगले ही घण्टे में में परिवर्तन की राजनीती में व्यस्त आपई महकमा राजघाट पर बैठा नजर आया था।

वैसे साल की शुरुआत में युगनायक केजरी अकेले नहीं थे जो ज्ञान का विमोचन करते नजर आए उधर दूर कर्नाटक के गृहमंत्री बंगलोर में छेड़छाड़ की घटना से इतने द्रवित हुए उनके अंदर बैठे विवेचक ने तत्काल घटना की वजह की जाँच कर पाया कि शराब पीकर हुड़दंग मचा रहे पुरुष मासूम थे और छिड़ने वाली महिलाओं का दोष था कि उन्होंने त्वचा प्रदर्शक वस्त्र धारण किये थे। समस्या सामाजिक है सो अगले ही दिन घटना का समाजवादीकरण हो गया। मुम्बई से अबु आज़मी ने संत मुद्रा धारण कर घटना का एक्सप्लेनेशन सोदाहरण दिया। संत आज़मी जी ने समझाया कि महिलायें शकर हैं और पुरुष चींटियां इसलिये शकर पर चींटियों के आने की प्रक्रिया सहज समझकर तूल न दिया जाये। अबु आज़मी जी ने यह भी समझाया आग को पेट्रोल दिखाओगे तो आग लगेगी ही। यहाँ मुझे थोड़ा तकनीकी कन्फ्यूज़न हो गया। इसमें आग कौन है और पेट्रोल कौन है। अगर महिलाएं आग हैं तो पुरुष पेट्रोल हो न हो क्या फ़र्क पड़ता है आग तो है ही और अगर पुरुष आग हैं तो महिलाएं पेट्रोल हों ना हों क्या फर्क पड़ा। अबु आज़मी कुछ अनर्गल संत निकले।

मैंने इस समाजवादी व्याख्यान की तकनीकी दिक्कत के निराकरण के लिए समाजवादी हैडक्वार्टर की ओर दृष्टिपात किया तो समाजवादी हैडक्वार्टर गम्भीर मुद्रा में चुनाव आयोग को साईकिल के तकनीकी पक्ष समझाता नजर आया। हैडक्वार्टर के चेहरे की गम्भीरता देखते हुए मैंने उधर से चुपचाप निकल लेना ही उचित समझा। अब मुझे नया ज्ञान प्राप्त हुआ....... "भय ज्ञान की उतपत्ति का प्रमुख कारण है" अपनी फजीहत से बचने को भी व्यक्ति मौन रहना श्रेयस्कर समझता है। इसके अलावा मैं पर्सनैलिटी डेवलपमेंट के उस शिक्षक की बात से पूरी तरह सहमत हूँ जिसने ज्ञान में भारी पड़ने पर अपने छात्रों को को समझाया था कि "ज्ञान अधोवस्त्रों की तरह होता है प्रदर्शन की अपेक्षा इसका धारण करना श्रेयस्कर है। अब ये बात अपने नेताओं को कौन समझाये। 

Monday, 9 January 2017

बेवजह की चर्चा

पहाड़ों में भारी बर्फबारी के बाद उधर से आती हवाओं ने मौसम कुछ ठंडा तो किया है। इधर भी सर्दी के ऐहसास ने चेहरों पर मुस्कान बिखेरी है। महिलाओं के सौंदर्य में सर्दी का मौसम हमेशा वृद्धि करता है यह भी एक अनुभव है जो सर्दियों की शाम उत्तर भारत के बाजारों में सहज अनुभव किया जा सकता है।

मेरी आदत ठंड को ठंड सा अनुभव करने की रही है सो जब तापमान 0 डिग्री से 12 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है मुझे मौसम अच्छा लगता है। हालाँकि मौसम अभी उतना सर्द हुआ नहीं है। जब हो जायेगा तब बेडरूम में 200 वाट का बल्ब लगा लूंगा। हीटर की तेज गर्मी सहन नहीं होती। जरूरत भी क्या है सर्दी को दोबारा गर्म करने की इसलिए कमरे में 3 या चार घण्टे जला बल्ब ही सुखद लगता है। एल ई डी लाइट्स के युग में झमाझम चमकती बल्ब की रौशनी कुछ अजीब लगती तो है लेकिन यदि साथ ही एल ई डी लाइट भी ऑन रखें तो सुनहरी सफ़ेद चमक सुखदायी है।

सम्बंधों पर जमी बर्फ़ के इलाज इतने आसान नहीं होते। जाने कैसे कब किस सम्बंध पर धीरे धीरे बर्फ़ की मोटी परत जम जाये कहा नहीं जा सकता। फिर यह परत न टूटती है न ही इसे तोड़ने इच्छा रह जाती है। यदि सम्बंधों पर जमी ठंडी परत टूट भी जाये तो बर्फ़ पर चटक सी लकीरें जैसे स्थायी हो जाती हैं। और जो इसे पिघला सके ऐसी आँच राख हुए रिश्तों में रहती नहीं।

दरअसल सम्बंधों का रख रखाव न तो कोई विज्ञान है न ही कला। यह नैसर्गिक अनुभव है जनित आवश्यकता है जो तत्काल होती है स्थायी होती है और शाश्वत है। यदि ऐसा नहीं है तो सम्बंध गैरजरूरी परिपाटी की तरह भी चलते जाते हैं जिनमे न सुखद शीतलता होती है न ज्वलंत आँच बस सम्बंध होते हैं क्योंकि वे कभी किसी कारणवश बन गए थे। कुछ सम्बंध दोस्ती या दुश्मनी के हम पिछले जन्मों से भी उठा लाते हैं लेकिन उनका होना सामान्य व्यवहार और जीवन में संभव नहीं होता।

ऐसे में यही कहूंगा कि किन्हीं सम्बंधों पर गर्व या अफ़सोस या शर्मिंदगी से बेहतर है उन्हें जस का तस आत्मसात कर लें। सम्बंधों के होने या ना होने की कला या विज्ञान पर समय लगाएंगे तो व्यर्थ ही होगा। सम्बंध अच्छे या बुरे क्षणिक या स्थायी व्यक्ति की सामर्थ्य से बाहर हैं।  

Monday, 2 January 2017

गर्मा गर्म साल मुबारक


                                             



दोस्तों नया साल मुबारक। मुबारकबाद देते हुए सोच रहा हूँ कि किस बात की  मुबारकबाद ज्यादा  मौंजू रहेगी, गर्म जनवरी की या 50 दिन गुजरने की या पूरे 365 दिन गुजरने की।  बहरहाल 2016 ने 2017 में प्रवेश किया तो नया साल मुबारक।

वैसे  सर्दियों में गर्मी की शुरुआत तो दीवाली के बाद ही शुरू हो गयी थी जब आला हजरत ने काली क्रय शक्ति पर गर्मी दिखाते हुए नोटबंदी की घोषणा कर डाली कुछ दिन तक यह गर्मी सरकार और पार्टी में दिखाई देती रही फिर गर्मी नवयुवा प्रौढ़ युवराज में जा पहुँची लगे एटीम और बैंकों के चक्कर काटने युवराज की गर्मी धीरे धीरे बढ़ती गयी पर मजाल हो जो सरकार ने कांग्रेस सरकार की बात पर ध्यान दिया हो।  अपनी गर्मी की इस अनदेखी से बाबा भाई युवराज इतने नाराज हो गए कि 2016 की गर्मी कम करने किसी ठंडे देश चले गए।

जनता थोड़ा बाद में गर्मी में आयी लेकिन बेचारी साधारण जनता अपने को जनार्दन समझ कर गरमा गयी थी सो पुलिस की गर्मी ने जनता का भ्रम तोड़ कर ठंडा कर दिया।  गर्मायी तो चप्पल वाली दीदी भी थीं और बहुत गरमायीं, दिल्ली  के मर्यादा पुरुषोत्तम मफलर हाकिम से लगाकर बाबा युवराज तक सब दीदी की गर्मी से अपने हुक्कों में आग भरने लगे लेकिन बुरा हो धूलगढ़ के अमन प्रेमियों का जो फ़िलहाल नोटबंदी को जुबान बंदी तक खींच ले आये। बिहारी बाबू भी कुछ काम न आये।

गर्मी की गहमा गहमी यूपी पहुँची तो दिल्ली के करोलबाग के बैंक में ऐसी उठापटक जाहिर हो गयी कि यूपी की बहनजी की आक्रामकता रक्षात्मक होकर मोर्चे से सरक गयी, लेकिन इसी बीच समाजवाद इतना गरमाया कि लखनऊ से दिल्ली के निर्वाचन सदन तक समाजवाद ही समाजवाद तपता हुआ नजर आ रहा है। पर इस बीच सरकारी गर्मी कुछ ठंडी हुई दीख पड़ती है,  आला हजरत की नव वर्ष की बधाई से कुछ ऐसा ही लगा। खैर जी ये बड़े लोगों और जनार्दन, जिसे चुनाव के बाद महज जनता का ही दर्जा हासिल होता है, के बीच का मामला है जैसे तैसे सुलट ही लेंगे।

असल में इस गर्म सर्दी से कोई दिक्कत है तो मुझे है। प्रिय पत्नि ने अक्टूबर से पहले ही ठंड में मुझ तक गरमाई पहुँचाने के उद्देश्य से जो खूबसूरत रजाई बनवाई थी बेड पर सजी हुई है कभी ओढ़ता हूँ तो कभी फेंकता हूँ लेकिन बेड पर सजी रजाई के फ़ोटो खेंच कर पत्नि को भेजता रहता हूँ जिससे कम से कम उसे तो तसल्ली रहे। गर्म सर्दी के कारण चिड़ियों को भी हर जगह खाना उपलब्ध है तो जो दाने का भंडार मैंने उनके लिए लाकर रखा है वह भी कम ही खर्च हो रहा है। इसी कारण सामाजिकता पर असर यह हुआ कि अलाव जलाकर राजनितिक चर्चाएं जो इस दौर में सुनने को मिल जाती थीं उनका आभाव है। कुत्ते अभी तक नवंबर के धोखे में सारी रात रोते हैं और बस रोते ही रह जाते हैं। माहौल है कि नोटबंदी की कड़की के बावजूद खुशगवार चल है गाजर का हलवा मजेदार नहीं लगता रस्मअदायगी भर रह गया है ब्रांडी की तरफ़ देखने का मन नहीं होता। ऐसे ठिठुरन वाली तेज सर्दी को याद करता रहता हूँ। बारिश ही आ जाये तो कोई तो बदलाव महसूस हो यूँ तो 16 का 17 हो जाना बड़ा नीरस है। इसी नीरसता के बीच से नए साल की गरमागरम मुबारकबाद।